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Friday, May 13, 2022

कॉलेज और प्रेम

Love in college
Library

 कॉलेज रोज़ जाता था। दिन भर प्रेमी जोड़े दिखते रहते थे या यूँ कहूँ कि आँखें खोजती रहती थी। एक लड़की रोज़ लाइब्रेरी में दिखती थी। एक दिन जब वो लाइब्रेरी में आयी तो साथ में एक लड़का कंधे पर बैग टाँगे उसके साथ साथ लाइब्रेरी में आया। लाइब्रेरियन ने डाँट दिया कि मालूम नहीं है कि बैग बाहर रखना होता है। लड़की हँस दी। लड़का मुस्कुरा दिया। दोनों घंटे भर लाइब्रेरी में बैठे रहे। लड़की अपने कोर्स की किताबें पढ़ती रही और लड़का कभी फ़ोन चलाता तो कभी यूँ ही किताबों के कुछ पन्ने पलट लेता। लड़की ने घंटे भर में क़रीब बीस पेज पढ़े। लड़के ने घंटे भर में दो पेज पढ़े। जिस लड़के को इतना नहीं मालूम कि लाइब्रेरी में बैग ले जाने की मनाही है मतलब वो लाइब्रेरी पहली बार आया होगा। दो पेज कम नहीं होते। मतलव प्रेम में बहुत ताकत होती है। प्रेम लड़के को किताबों के क़रीब तो ले ही आया।


नितीश कुमार
Nitish Kumar


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....

Thank you


Nitish Kumar
(Nitish Ke Alfaaz)
nitishkealfaaz.blogspot.com


Saturday, March 13, 2021

रहस्य

 

Horror
रहस्यमयी सड़क


WARNING: Reader's discretion is advised, should not be read by anyone under the age of 16.


रात के 2 बज रहे हो, आप घर में अकेले हो, अचानक आपका घर का गेट कोई खटखटाता है और आपको पता है कि कोई आने वाला नही है, तो आप दरवाजा खोलेंगे या नही? आप जब भी भूत प्रेत के बारे में सुनते है तो आपके दिमाग में सफेद साड़ी और सफेद बालों वाली औरत, ठंड की वो काली रात, पायल की आवाज, किसी के रोने की आवाज, कब्रिस्तान का दृश्य, ये सब आपके दिमाग मे जरूर आता होगा। मैं जब भी भूतो के बारे में लिखता हूं तो मुझे खुद कभी कभी डर लगता है। मुझे Subconscious mind की वजह से लगता है की जिसके बारे में मैं लिख रहा हु वो मेरे कमरे में खड़ा है, मुड़ के देखता हूं तो कमरे के शीशे, हिलते हुए पर्दो के अलावा कुछ नही दिखता।


डर ही डर को पैदा करता है, कहते है जिस रास्ते के बारे में ना पता हो उस पर कभी नही जाना चाहिए, कभी भी नही। सालो पहले की बात है, एक आदमी देर रात अपने घर जा रहा था। हाईवे की तरफ वो जा रहा था तभी उसे एक कच्चा रास्ता दिखता है। उसे लगा इस रास्ते से वो हाइवे पे जल्दी पहुच जाएगा, उसने तुरंत अपनी बाइक उस कच्चे रास्ते पे मोड़ ली और यहीं उसने सबसे बड़ी गलती कर दी। थोड़ी दूर चलने के बाद एक ऐसी जगह आती है जहां बाइक की रोशनी के अलावा और कोई रोशनी नही थी। कहते है कि बुरी शक्तियां अंधेरे में अपने चरम पर होती है। वो बार बार अपनी घड़ी में समय देख रहा था। वो समझ चुका था कि ये रास्ता सही नही है। वो पसीने में लत पत तेजी से अपनी बाइक भागा रहा था। आचानक उसे कोई आवाज सुनाई देती है, जैसे लगता है उसे कोई बुला रहा है। वो ना चाहते हुए भी बाइक अचानक रोकता है। उसे वहाँ बड़ी अजीब सी चीज दिखाई देती है। कहते है आप कहीं जा रहे हो और आपको कुछ अजीब सी चीज दिखाई दे तो उसे टोकना नही चाहिए। वो आदमी जब सहम के आगे बढ़ता है तो देखता है एक औरत वहां खड़ी है। सबसे अजीब बात वो तो उस औरत को देख रहा है मगर वो औरत उसे नही देख रही, मतलब वो औरत सीधे देख रही है, सड़क के दूसरी ओर। पूरा अंधेरा, सुनसान जगह, आधी रात का वक़्त और वो औरत! आँखों मे डर, माथे पर सिकन। वो अपना थूख भी नही घोट पा रहा है। पसीने में लथ पथ अपनी आवाज भी नही निकाल पा रहा, ना कदम आगे बढ़ रहे है ना ही पीछे। वो औरत धीरे धीरे नजदीक आ रही है, नजदीक और नजदीक। अब जो वो देखता है उसे देख के उसका शरीर ठंडा पड़ जाता है, आँखें झपकना बन्द कर देती है, मुह खुला का खुला है। वो चीज़ देख मानो उसके होश उड़ गए है।


सालों पहले एक लड़की हुआ करती थी Anneliese Michel, सोलह साल की उम्र आते आते उसे हवा में अजीब अजीब आकृतियां दिखने लगीं, वो आत्माएं उसे उसका नाम ले के अपने पास बुलाती थीं, पास आओ मेरे, आओ मेरे साथ, Anneliese ज़ोर ज़ोर से चिलाने लगती थी, रोने लगती थी पर उसके अलावा ना तो वो आत्माएं किसी को दिखाई देती थीं, ना तो सुनाई देती थीं। Anneliese के माँ बाप ने उसका बहुत इलाज करवाया पर दिन बा दिन उसकी हरकतें और अजीब होती चली गयीं, वो रात में एकदम से उठ के खिड़की के बाहर कुछ देखने लगती थी, खिड़की के बाहर बस एक बड़ा सा पेड़ था, सड़क पे कोई भी नहीं, कभी कभी वो एकदम ठीक हो जाती थी और कभी कभी डर के मारे अपने पैर तक ज़मीन पे नहीं रखती थी, उसे लगता था जैसे ही वो अपने पैर ज़मीन पे रखेगी कोई उसे पकड़ लेगा। तेईस साल कई उम्र में उसकी मौत हो जाती है, मरने से कुछ दिन पहले तक उसे लगता था कि उसके कमरे से उस पेड़ की दूरी कम हो रही है, अब वो हर रात खुद को शीशे में देखकर पता नहीं किससे कहती थी, आओ मेरे पास, पास आओ। इस हालत में आते आते उसके माँ बाप को भी पता चल चुका था कि Anneliese possessed है, उन्होंने उसकी दवाइयां बंद करवा दी और church से priests बुलवाये, Anneliese उन priests को देखते ही चिल्लाने लगती थी, गन्दी गन्दी गालियां देने लगती थी, रोने लगती थी और एक दिन वही हुआ जिसका डर था, 1 July 1976 को Anneliese Michel की अपने ही घर में मौत हों जाती है। वो सिर्फ 30 किलो की थी जिस दिन उसकी मौत हुई, डॉक्टरों ने कई साइंटिफिक theories दीं कि आखिर में dyhradation की वजह से Anneliese की मौत हुई पर आजतक किसी को ये पता नहीं चला कि क्या उसे सच में उस पेड़ पे आत्माएं दिखती थीं? इनफैक्ट Anneliese Michel की कहानी इस दुनिया की सबसे रहस्यमयी कहानियों में से एक है। हालांकि बाद में Priest और Anneliese के माँ बाप को 6 माह की सजा हुई, Negligent Homicide के लिए। पढियेगा कभी Anneliese के बारे में गूगल, विकिपीडिया सब पर है। इन्फेक्ट इसके ऊपर कुछ फ़िल्म और बनी है।


रात के साढ़े तीन बजे वो आदमी बाइक पे जिस परछाई को एक औरत समझ रहा था वो कोई औरत नहीं बल्कि एक आदमी का कटा हुआ सर था जो एक खंडर की दीवार पे रखा हुआ था। ये देख के उस आदमी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और पता है इससे भी ज़्यादा डरावनी बात क्या हुई थी उस रात, उस कटे हुए सर के ठीक बीच में एक बड़ा सा लाल रंग का टीका लगा हुआ है जो अभी भी उसकी नाक से नीचे गिर रहा है।


पता है, अगर आपको वजह पता चल जाए ना कि ये इस वजह से हुआ है, जैसे रात में घंटी बजी तो आपको पता हो कि कोई आने वाला था तो आपको उतना डर नहीं लगेगा। पर इस कहानी की सबसे अजीब बात ये थी कि पुलिस को आजतक पता नहीं चला कि वो सर किसका था। किसने मारा उसे ये आजतक किसी को पता नहीं चला और यही बात तो डर पैदा करती है। जो कहानियां कभी ख़तम नहीं हो पाती उनका अंत अपने दिमाग में सोच सोचकर डर लगने लगता है। Anneliese Michel को क्या सच में भूत दिखते थे। उसकी तस्वीर देखेंगे तो शायद आप भी सोचने लगेंगे, उस पेड़ में उसे क्या दिखता था? वैसे भी उसकी कहानी को दुनिया की सबसे रहस्यमयी कहानियों में गिना जाता है....!


From this story, I am not promoting any type of Superstitions. The purpose of this story is only for entertainment purpose nothing else.

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Wednesday, May 27, 2020

भूतिया स्टेशन (Part 1)

Horror Story
भूतिया स्टेशन
डर..... ये एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही मन विचलित हो जाता है। पता नही क्यों लेकिन हमारे मन में बचपन से ही डर बुरी तरीके से बैठा दिया जाता है। 'सो जाओ नही तो भूत आ जायेगा', 'ये खा लो नही तो भूत तुम्हें खा जाएगा', 'जो रोता है भूत उसके पास आ जाता है', 'बाहर अकेले मत जाना भूत घूमता है' और भी बहुत कुछ। जिस उम्र में बच्चों को अपना नाम भी नही पता होता है, खाना क्या तीज है वो तक नही पता होता है, और हम उसे ये सब जरूरी बातें समझाने की जगह भूत के बारे में बताते है। मतलब उन्हें छोटी से छोटी चीज़े कुछ भी नही पता होती, लेकिन भूत के बारे में पता होता है कि भूत एक ऐसी चीज़ है जो बहुत बहुत बहुत ज्यादा खतरनाक है। खुशी क्या होती है दुख क्या होता है ये भी उन्हें नही पता होता लेकिन डर क्या होता है वो 6 महीने के बच्चों को भी अच्छे से पता होता है। जिस उम्र में बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप में मजबूत बनाना चाहिए उस उम्र में रोजाना भूत, आत्मा, चुड़ैल का नाम लेकर, डरावनी कहानी सुना सुना कर हम बच्चो को डरपोक बना देते है। उनके दिल दिमाग में पूरी तरह से डर को बैठा बैठा दिया जाता है।

तो आज की कहानी भी एक डर पे ही आधारित है।

पिछली बार की कहानी (भूतिया मकान) पढ़ने के बाद मेरे एक दोस्त ने अपनी कहानी सुनाई की कैसे डर किसी पर हावी हो जाता है और ये डर उस व्यक्ति से कुछ भी करवा सकता है।

(अब कहानी उसके शब्दों में)

WARNING: Reader's discretion is advised, should not be read by anyone under the age of 12.

मेरी बाहरवीं की परीक्षा होने के बाद मैं कुछ दिनों के लिए गांव चला गया। गाँव में दादा-दादी रहते है। उनकी मदद के लिए दिन में एक नौकर रहता हैं लेकिन हम उन्हें चाचा जी कहते है। फ़ोन पर दादा जी ने बताया था कि हमारे गांव की छोटी रेलवे लाइन अब बड़ी रेलवे लाइन बनने जा रही है इसलिए रेल सेवा बंद कर दी गयी है। इसलिए मैं बस से गांव गया। अब बड़ा हो गया था इसलिए पहली बार अकेले कहि गया था। बस से गांव के नजदीक के स्टैंड पर उतरने के बाद मैंने गांव के रेलवे स्टेशन वाला रास्ता चुना, ये देखने के लिए की काम कैसा चल रहा है। ये क्या! यहां तो कुछ भी काम नही हो रहा, पुराना रेलवे स्टेशन खंडर बन चुका है। पूरा रास्ता शमशान की तरह वीरान पड़ा है। बाद में मैंने दादा जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि वहां मजदूरों ने भूत देखा था तब से कोई वहां काम नही करता तुम वहां से क्यों आए? उस रास्ते से कोई आता जाता नही वहां बहुत लोगो ने भूत देखा है! भगवान का शुक्र है कि तुम सही सलामत आ गए अब आगे से उधर मत जाना। ये लाइन सुनते ही मैं अंदर से पूरा कांप गया। पसीने छूट गए, रोंगटे खड़े हो गए कि अगर वहां मुझे भूत मिल जाता तो! बचपन से ही भूत से दुनिया ने इतना डरा रखा था तो ये डर तो लगना ही था। अब पता नहीं क्यों लेकिन मुझे अब रात को हर चीज़ों से डर लगने लगा। ऐसा लगता कि घर के शीशे से मुझे कोई देख रहा है। कानों को छूती हुई हवाएं कुछ बोल रही है। घर की खिड़कियों से कोई अंदर आ रहा है। इन सब बातों पर मेरा ध्यान ना जाए तो मैं फ़ोन चलाने लगता तो अचानक लगता कि कोई मेरे पीछे से मुझे कोई देख रहा है और आचानक से कंधे पर हाथ रखेगा। जैसे ही मैं पलंग से उतरूंगा तो कोई मुझे पलंग के नीचे से खींच लेगा। मेरे घर की छत से वो रेलवे स्टेशन नजर आता है। जब भी मैं अपने छत पर जाता हूं और उस स्टेशन को देखता हूं तो उसे ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे वहां से बुला रही है की 'तुम आओ मैं तुमसे मिलना चाहती हूं'। मैंने सोचा कि दादा-दादी को ये बात बता दु लेकिन दिमाग में आया कि वो क्या सोचेंगे? शायद यही मैंने सबसे बड़ी गलती कर दी। एक रात मैं सो रहा था और अचानक मेरे सपने में वही टूटा फूटा रेलवे स्टेशन नजर आता है। वो देखते ही मैं इतना सहम जाता हूं कि मेरी नींद खुल जाती है। पसीने से लत पत जब मैंने घड़ी देखी तो रात के 2 बज रहे थे। मैं पूरा डर चुका हूं, घड़ी की टिक-टॉक टिक-टॉक और डरा रही है। कोई मुझे आवाज दे रहा है। मैं जोर जोर से भागने लगता हूँ। दादा-दादी के कमरे की तरफ नही, उसी रेलवे स्टेशन की तरफ, हां! उसी स्टेशन की तरफ, पता नही क्यों लेकिन मैं भागा जा रहा हूँ। मुझे खुद कुछ समझ नही आ रहा, ना चाहते हुए भी मेरे कदम आगे बढ़ रहे है। जैसे लग रहा है कोई सफेद चीज़ मेरे पीछे पीछे भाग रही है। मेरे हर कदम के साथ वो भी अपने कदम बढ़ा रही है। अब पायल की आवाज मेरे कानों को सुनाई दे रही है। जैसे ही पीछे मुड़ता हूं आवाज गयाब हो जाती है। जो चाँद रोज प्यारा लगता था वो भी आज डरावना लग रहा है। मैं भाग रहा हूं, पायल की आवाज तेज हो रही है। मैं चिल्ला रहा हूं, पायल की आवाज और तेज हो रही है। जैसे जैसे मैं भाग रहा हूं आवाज बढ़ती ही जा रही है। अचानक मैं पीछे मुड़ा! मेरे पीछे कोई नजर नही आ रहा मेरी नजर मेरे घर की तरफ गयी वहां छत स कोई मुझे टाटा कर रहा है। मैं अब फिर स्टेशन की और भागने लगा। कदम लडख़ड़ा रहे है, सांसे अटक रही है, पसीने से पूरा शरीर भीग चुका है। पायल की आवाज अभी भी मेरा पीछा कर रही है। मैं जोर जोर से चिल्ला रहा हूं मगर कोई भी नजर नही आ रहा गले से आवाज भी नही निकल पा रही फिर भी मैं चिल्ला रहा हूं। स्टेशन पर अब मैं पहुच गया। रात अब अपने चरम पर पहुच चुकी है। मुझे ऐसा लग रहा है यहां पर कोई परछाई मुझे देख रही है। अचानक परछाई ने अपनी जगह बदल ली। मैं जल्दी जल्दी अपनी गर्दन घुमा रहा हूं, परछाई फिर मुझे किसी ओर तरफ से देखने लग रही है। मुझे कुछ समझ नही आ रहा क्या हो रहा है। डर पूरी तरह से मुझ पर हावी हो गया है। एक छोटी से आहट से भी सांसे रुक रही है। ऐसा लग रहा है कि स्टेशन की छत पर मुझे कोई बुला रहा है। स्टेशन के छत की सीढ़ियों की और अब मै भाग रहा हूं। अचानक से मैं गिर गया। खड़ा नही हुआ जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे कोई मुझे दबाने की कोशिश कर रहा है। जैसे तैसे मैं उठ गया। फिर चिल्लाते हुए गिरते उठते मैं स्टेशन की छत पर पहुच गया। आंखों में डर, माथे पर पसीना। चारो तरफ बस अंधेरा अंधेरा और अंधेरा। ये क्या! छत पर कोई खड़ा है। डरावना चाँद, पायल की आवाज और ये डरावनी रात, ऐसा लग रहा है जैसे ये पहले भी कभी हुआ है। अब वो छत स कूदने की कोशिश कर रहा है। मैं कांपते कांपते उसकी और बढ़ रहा हूं। ठंडी हवा छू कर निकल रही है तो लग रहा कोई पीछे से आ कर कोई मेरा गला दबा देगा। उसके पास अब मै जैसे तैसे डरते डरते पहुच गया। अब वो कूदने की कोशिश कर रहा है, मैं उसे बचाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे फिर कुछ समझ नही आ रहा है मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ। लग रहा है जैसे मेरा शरीर अब मेरा नही रहा अब ये किसी और का हो गया है। कहते है रात को आत्माओ की  शक्ति दुगनी हो जाती है और वो आम लोगो की बीच में आ जाती है। जिन्हें पता चल जाये कि आत्मा आस पास है उन पर वो हावी हो जाती है। शायद उस डरावनी रात भी मेरे साथ यही हुआ था। वो कूद गया! उसे बचाने के लिए अब मैं भी कूद गया....! ये क्या! मेरे कूदते ही वो नजर आना बंद हो गया! पायल की आवाज अब जोर-जोर से डरावनी हँसी में बदल गयीं। ऐसे लग रहा है जैसे वो हँसी मुझे कहा रही है कि मैंने अपना काम कर लिया। मैं जमीन पर गिरता हु। आंखे बंद हो रही है और आंखें बंद हो गयी। अब अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा और बस अंधेरा.....!

To be continued....


Nitish Kumar
नितीश कुमार

Disclaimer:


From this story, I am not promoting any type of Superstitions. The purpose of this story is only for entertainment purpose nothing else.

If someone's story mirrors this, it is just a coincidence.

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Sunday, December 29, 2019

भूतिया मकान


Horror Story
Haunted House

भूत, प्रेत, साया, डायन आदि पर आप चाहे विश्वास करते हो या नहीं, लेकिन उनके अस्तित्व को आप पूरी तरह नकार भी नहीं सकते हैं। यह एक ऐसा विषय है जिस पर काफी बातचीत होती है लेकिन इसका सच केवल वही जानता है जो इसे महसूस करता है।

स्कूल में हमारा स्पोर्ट का पीरियड था। हम 6-7 बच्चों ने डिसाइड किया आज हम ग्राउंड में नही जायेगे। यहीं क्लास में बैठ के गप्पे मरेंगे। हम सब एक सर्किल बना कर क्लास में बैठ के अपनी बाते करने लगे। अचानक वहाँ बातो बातो में भूतों की बात होने लगी। अब जैसा हर जगह होता है कि 'भूत-प्रेत होते है या नही?' इस टॉपिक पर बहस होने लगी। कोई कहने लगा  होते है कोई कहता नही होते। इन्ही आवाजों के बीच एक धीरी सी सहमी हुई आवाज आती है "होते है! कोई मानो या नही, लेकीन होते है, मैंने देखा है!" चारो तरफ सन्नाटा पसर गया। यह आवाज थी एक मेरे क्लासमेट की। सबके मुँह से एक साथ निकला।
कब? कहाँ? कैसे? 

(अब कहानी उसके शब्दों में)

ये बात तब की है जब मै 13 साल का था। हम जिस पार्क में खेला करते थे उसके पीछे एक टूटा फूटा दो मंजिला मकान था। जो भूतिया मकान के नाम से जाना जाता था। कहते थे कि इस मकान में एक वेल सेटल्ड फैमिली रहती थी, पति पत्नी और उनका एक लड़का उम्र कुछ 11-12 साल होगी। अचानक एक बीमारी से उस लड़के की मौत हो गई थी। इस दुख का बोझ वो दोनों नही उठा पाए, और कुछ दिनों बाद उनकी भी मौत हो गई। उसके बाद काफी लोगो ने उस मकान में नकारात्मक शक्ति होने का दावा करने लगे।

हम एक दिन बरसात के दिनों में शाम को उस पार्क में खेल रहे थे। आसमान को पूरी तरह बदलो ने ढक रखा था। सुन सुन कर ठंडी हवाएं कानो को छू कर गुजर रही थी। खेलते खेलते हमारी बॉल उस मकान में चली गयी। अब क्या? सब कुछ ना कुछ बोलने लगे।
कौन जाएगा बॉल लेने?
जिसने मारी है वो लाएगा।
रहने देते है शाम हो गयी अब कौन जाएगा?
मै उस वक़्त थोड़ा हिम्मत वाला था, मैंने बोला सब साथ में चलते है।
पागल है क्या! अंधेरा सर पर है और तू भूतों से पंगा लेगा?
भूत-प्रेत कुछ नहीं होते।
होते है! मम्मी बताती है।
हाँ, नही जायेगे, चलो घर चले, वैसे ही डर लग रहा है।
सही बोल रहा है ये, साथ में चलते है। (मेरे एक दोस्त ने मेरा साथ दिया)
नही मै नही जाऊँगा। डर लग रहा है।
हाँ! इस घर में भूत है मै भी नही जाऊँगा।
(अचानक एक आवाज आती है पीछे से)
अरे! नही है इस घर में भूत, मै एक दिन गया था।
(कोई 11-12 उम्र का लड़का हमारी तरफ आते हुए बोलता है)
तुम कौन?
अरे! मै भी यही पास में रहता हूँ। मै एक दिन गया था इस घर मे। कुछ भी ऐसा वैसा नहीं था। चलो सब साथ मे चलते है।
तुम्हें तो कभी यहाँ हमने देखा नही।
मै भी तो यही खेलता हु पता नहीं क्यों नहीं देखा? चलो जल्दी चलते है फिर घर भी जाना है।
हां यार चलते है, फुर्र से जाकर बॉल ले आते है। (मैंने उसकी बात में हामी भरी)
(अब सब ने हिचकिचाहट में हाँ में अपना सर हिला दिया)

अब हम कितने भी हिम्मत वाले क्यों ना हो, लेकिन दिल मे थोड़ा डर तो रहता ही है। हम सब धीरे धीरे घर की और बढ़ने लगे, पैर लड़खड़ा रहे है, सर्द हवाएं छू कर गुजर रही है। सूरज छुपने को तैयार है। बारिश होने से पहले का वो मंजर नजर आ रहा है। अचानक बादल गरजता है।
मम्मी! (एक लड़का चिलाता है)
अरे! कुछ नही हुआ बारिश होने वाली है, जल्दी चलते है। (उस लड़के ने गुस्से में कहा)
उस घर का मै दरवाजा खोलता हूं, घर की और गहरी सांस लेते हुए हम आगे बढ़ते है। घर मे थोड़ा अंधेरा है। चारो और दीवारों पर मिट्टी की परत जमी है। हर तरफ मकड़ी के बड़े बड़े जाले है। जिसमे मकड़ियां खुद के ही जाल में फस कर तड़प रही है और मरने का इंतजार कर रही है। हम काँपते हुए आगे बढ़ रहे है। जैसे जैसे कदम आगे बढ़ रहे है दरवाजे से आ रही रोशनी कम होती जा रही है। घर का तापमान धीरे धीरे कम होता प्रतीत हो रहा है। सन्नाटा पसरा हुआ है। एक दूसरे की सांसे हमे सुनाई दे रही है। हम घर के काफी अंदर पहुंच गए है। हमारा शरीर ठंडा हो रहा है। अचानक किसी के रोने की आवाज आती है। गला हमारा भर गया। सांसे रुक गयी। सब चिलाते हुए भागने लगे। उन सब के पीछे मै भी जैसे ही दो कदम भागा किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। गले से आवाज निकलना बंद हो गयी। रोंगटे खड़े हो गए। पैर ठंडे पढ़ गए। शरीर वही जम गया। सब घर से भाग गए है। अब अकेला सिर्फ मै इस घर मे! 
अरे! मै हूँ, डर क्यों रहे हो? देखो! बिल्ली रो रही है। (जो लड़का हमे बाहर मिला था उसने मुझे रोकने के लिए मेरा हाथ पकड़ा था।) 
भाई तुम भी चलो, सब भाग गए हम ही दोनों अकेले रह गए है। बहुत डर लग रहा है मुझे। (मैं डरते हुए उस लड़के को कहता हूं)
मै साथ मे हु ना! डरना क्या? बस बॉल ढूंढ लेते है। (ये बोलते ही वो आगे बढ़ता है, मेरे कदम भी नाजाने ना चाहते हुए भी उसके पीछे बढ़ने लगते है)
आगे मैं ये क्या देखता हूं? वहां एक पूजा का सिहांसन बना हुआ है। बीच मे यज्ञ की जगह जिसमे कुछ जली हुई लकड़ियों की राख है। उसके चारों तरफ़ बैठने की गद्दी है। लग रहा है कुछ दिन पहले ही वहां यज्ञ हुआ है। ये क्या? मुझे धुएं की खुशबू महसूस हो रही है। लग रहा है अभी अभी कोई यहां यज्ञ करने लगा। घर पूरा ठंडा हो गया है। चेहरे पे पसीना। वहां एक तस्वीर है जिसपे माला है। तस्वीर देखने के लिए मै आगे बढ़ता हूं। तस्वीर पलट कर देखता हूँ। सांसे रुक गयी। पीछे से कोई जोर जोर से हंसने लगा। मै दरवाजे की ओर भागा। दरवाजा बंद हो गया। मै ऊपर की सीढ़ियों की ओर दौड़ा। बादल फिर गरज रहे है। हसने की आवाज थमने का नाम ही नही ले रही। मै सीढ़ियों से टकरा कर नीचे गिरता हूं। उठा नही जा रहा लेकिन फिर भी पूरी ताकत लगा कर उठता हूं। जितनी ताकत है उतनी ताकत से ऊपर की ओर दौड़ रहा हूं। लग रहा है कोई छाया भी मुझे पकड़ने मेरे पीछे दौड़ रहा है। जैसे जैसे कदम बढ़ रहे है दिल की धड़कने और तेज होती जा रही है। ये क्या? ऊपर तो पूरा अंधेरा है, कहि कुछ भी नहीं दिख रहा। चिलाया भी नहीं जा रहा है।शरीर पूरा हल्का हो गया है। लग रहा है अब हिम्मत नहीं है कुछ भी करने की। मैं अब पूरी हिम्मत हार चुका हूं। एक छोटी सी रौशनी नजर आयी। यही रोशनी अब उम्मीद लेकर आयी है। मै खुशी से उस रौशनी की और बढ़ने लगा। ये रोशनी तो स्ट्रीट लाइट की है जो बालकनी के दरवाजे से आ रही है। मैं पूरी ताकत लगा कर दरवाजा खोलता हु। अब मै घर की बालकनी पर पहुच गया। बहार खड़े मेरे दोस्त चिला रहे है। 
क्या हुआ? 
क्या हुआ?
बहार आजा।
पागल है क्या तू? ऊपर क्या कर रहा है?
जल्दी नीचे आ।
चल अब घर चलते है।
बादल जोर जोर से गरज रहे है। सूरज डूब चुका है। रात हो चुकी है। चारो और अंधेरे के बीच स्ट्रीट लाइट के नीचे दोस्तो का डरा हुआ चेहरा। मुझपे बारिश की बूंदे पड़ने लगी। मेरे जुबान से शब्द बहार नही आ रहे। मै कुछ बोलना चाह रहा हूं, लेकिन लग रहा है मुझे कोई बोलने से रोक रहा है। अचानक मै बालकनी से नीचे गिर गया। धीरे धीरे आँखे बंद हो गयी और जब खुली तो मै हॉस्पिटल में था।

(अब खुद मेरे शब्दों में कहानी)

अब मेरे दोस्त की इस कहानी के बाद हमारे स्कूल के उस क्लास में हम 6-7 बच्चे बस एक दूसरे का चहरा देख रहे थे।
मैंने अपने उस दोस्त से धीरी आवाज में पूछा "जो लड़का तुझे बहार मिला था, उसका क्या हुआ?"
मेरे दोस्त ने सांसे भरते हुए पसीना पोछते हुए आंखों में आँखे डाल कर (उसकी आँखों में डर था) धीमी आवाज में कहा "वो तस्वीर उस लड़के की ही थी, और उसी ने मुझे बालकनी से धक्का दिया था।"

Nitish Kumar
नितीश कुमार


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