Friday, May 13, 2022

कॉलेज और प्रेम

Love in college
Library

 कॉलेज रोज़ जाता था। दिन भर प्रेमी जोड़े दिखते रहते थे या यूँ कहूँ कि आँखें खोजती रहती थी। एक लड़की रोज़ लाइब्रेरी में दिखती थी। एक दिन जब वो लाइब्रेरी में आयी तो साथ में एक लड़का कंधे पर बैग टाँगे उसके साथ साथ लाइब्रेरी में आया। लाइब्रेरियन ने डाँट दिया कि मालूम नहीं है कि बैग बाहर रखना होता है। लड़की हँस दी। लड़का मुस्कुरा दिया। दोनों घंटे भर लाइब्रेरी में बैठे रहे। लड़की अपने कोर्स की किताबें पढ़ती रही और लड़का कभी फ़ोन चलाता तो कभी यूँ ही किताबों के कुछ पन्ने पलट लेता। लड़की ने घंटे भर में क़रीब बीस पेज पढ़े। लड़के ने घंटे भर में दो पेज पढ़े। जिस लड़के को इतना नहीं मालूम कि लाइब्रेरी में बैग ले जाने की मनाही है मतलब वो लाइब्रेरी पहली बार आया होगा। दो पेज कम नहीं होते। मतलव प्रेम में बहुत ताकत होती है। प्रेम लड़के को किताबों के क़रीब तो ले ही आया।


नितीश कुमार
Nitish Kumar


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Monday, April 25, 2022

जीवन की सीढ़ी।

जीवन की सीढ़ी
जीवन की सीढ़ी

तुम यहाँ तक तुरंत या एक झटके में नहीं आये हो। याद करो तुमने कितनी कठिनाईया और कितनी मुश्किलों का सामना किया है, तब जाकर आज तुम यहाँ खड़े हो। कितनी मुश्किल से सीखा था पाँच लकीरों वाली कॉपी में 'अ' और A लिखना, और आज तुम Running में लिख रहे हो। कितनी मुश्किल से तुमने सीखा था अंको को और Fractions को जोड़ना, नाजाने कितने ही Word-Meaning याद किये होंगे, घूमते घूमते कविताए और पर्यायवाची को याद किया होगा। कितनी मुश्किल से याद की थी 17 की टेबल, लगाया था BODMAS, Componendo-Dividendo, कितनी तिकड़म से किये थे नाजाने कितने ही LHS = RHS, Area, Volume, Pythagoras जैसे अनगिनत सवाल।

अपने लड़कपन में, जब जवानी उफ़ान पर होती है, जब चंचलता चरम पर होती है, जब तुम्हे देना चाहिए था अपने प्यार को वक़्त तब तुमने अपना सब कुछ दिया HC Verma, Organic Chemistry, RD Sharma और Differentiation को। 

कितने ट्यूशन, कितनी क्लास, कितने टेस्ट दिए तुमने। 11वी 12वी के 100 चैप्टर एक बार में दिमाग में बिठाये तुमने, दिये इस देश के सबसे कठिन एग्जाम IIT, JEE, NEET, AIIMS, CAT.

जब कहा गया कि सफर यहीं तक था, उसके बाद भी दिये और और और एग्जाम। हर समय पर बार बार, तुमने अलग अलग जनसंख्या से प्रतिस्पर्धा की, रिश्तेदारों के तानों से प्रतिस्पर्धा की, खाली जेब से प्रतिस्पर्धा की, प्रेम से प्रतिस्पर्धा की। कितनी क्लास, कॉलेज, Exams, Viva, Marksheets, Cut offs से होते हुए तुम आज यहाँ तक पहुँचे हो।

कोई भी जब तुम्हें कहे कि तुम काबिल नहीं हो, ये सब याद करो, एक झटके में नहीं, तुम साल दर साल, एक एक सीढ़ी चढ़के यहाँ तक पहुँचे हों। और अगर तुम यहाँ तक पहुँचे हो, तो आगे कहीं भी पहुँच सकते हो। वक़्त तुम्हें सिर्फ आज के पड़ाव पर रोक सकता है, पर इससे नीचे नहीं गिरा सकता, वो तुम्हारी कांस्टेंट कमाई है। आज नहीं तो कल धीरे धीरे तुम कहीं भी पहुँच सकते हो।

कोई माई का लाल तुम्हें ये कह नहीं सकता कि तुम क्या हो? हमेशा हमेशा इस बात को याद रखना... कि तुम एक झटके में यहाँ तक नहीं पहुँचे हो।


नितीश कुमार
Nitish Kumar



  • कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता,
       एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो ।

  • मेरे सीने में ना सही, तेरे सीने में सही,
       हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए ।

    -दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार
दुष्यंत कुमार


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Friday, April 8, 2022

युद्ध

Ukraine Vs Russia
Ukraine vs Russia

युद्ध जब समाप्त होगा और तुम विजय होगे। तुम इस जहां के सिकंदर बन चुके होगे। तब चारो ओर रणभूमि में बस लाशो का सेलाब होगा। तुम उन लाशो के ढेर पर खड़े होकर जश्न बनाओगे। मगर तुम्हारे जश्न में तुम्हारा साथ देने वाला कोई भी नही होगा। तुम देखोगे कि तुम कितने अकेले हो चुके हो। तुम तड़पोगे अपने जीत के किस्से सुनाने के लिए। तुम्हारे पास अब सब कुछ होगा मगर तुम्हारे जीत के किस्से सुनने के लिए एक जोड़ी कान भी तुम्हारे नसीब में नही रहेगा। क्योंकि ये लाशें तो ना ही सुन सकती और ना ही तुम्हारी जीत देख सकती है।


मैं चाहता हूं बंजर जमीन पर योद्ध लड़ा जाए। योद्धाओं के हाथ मे हथियार की जगह बीज और फावड़े दिए जाएं। इंसानो पर हथियार चलाने की जगह बंजर जमीन पर पूरी ताकत से फावड़ा चलाया जाए और बीज रोपा जाए। जो सबसे ज्यादा गुलाब उगयायेगा वो विजेता घोषित किया जाएगा। जीत किसी की भी हो ये दुनिया खुशबू सुंगेगी, लाशो की बदबू तो वैसे ही बहुत सुंग ली है। 


नितीश कुमार
Nitish Kumar


Russia Ukraine
After War

Russia Vs Ukraine war
Life After War



कौन शासन से कहेगा, कौन समझेगा
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है
-दुष्यंत कुमार


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Friday, December 31, 2021

2021 का मंजर

 

Covid 19
Covid-19 or Corona Virus (SARS-CoV-2)

2021 का मंजर!


साल बदलने को है, 
हाल बदलने को है।
बदलने को है ये कैलेंडर,
बदलने को है ये दिसंबर।।

मगर याद है वो सारा मंजर,
एक एक तस्वीर आज भी है हमारे अंदर।
अस्पताल के बाहर लगती वो कतारे,
धृतराष्ट्र बनी हमारी वो सरकारें।।

चीखता चिल्लाता हमारा देश,
ऑक्सीजन के लिए तड़पता स्वदेश।
मदद के लिए दिखते हज़ारो संदेश,
और हमारे नेताओं का बदलता वेश।।

ना जाने कितनो ने अपनो को खोया,
कितनो ने अपने सपनो को खोया।
खुशियों में हर दम जो नजर आया,
उन्हें ही जरूरत में खुद से दूर पाया।।

देखो हमारी किस्मत में कैसी सरकारे आयी,
जिन्होंने कहा ऑक्सीजन बिन किसी की मौत ना हुई।
ये कहते उन्हें तनिक भी लाज ना आयी,
ऑक्सीजन के लिए तड़पते देश की तस्वीर नजर ना आयी।।

पूण्य है वो लोग जिन्होंने ऐसे वक्त में इंसानियत दिखाई,
सोनू सूद - कुमार विश्वास जैसे कितनो ने कितनो की जान बचाई।
है नमन उन सभी को जिन्होंने भगवान का रूप बन देश को बचाया,
है नमन उन सभी परिवारों को जिन्होंने इस वर्ष अपनों को खोया।।

आओ करते है हम एक वादा,
फॉलो करेंगे कोरोना का हर एक कायदा,
ये मंजर फिर नही आने देंगे।
साथ मिल ओमिक्रोन को हरा देंगे।।

नितीश कुमार
Nitish Kumar

We’ve lost so many souls this year 2021. We praying that God give peace to all the departed souls. Our Condolences with the families who lost their lovable one.

Hope this new year is filled with health, love, prosperity and loads of fun! 

Happy New Year...


Warning: Below images may distract you.
चेतावनी: नीचे दी गयी तसवीरें आपको विचलित कर सकती है।

Covid-19 Corona Virus
Family members of a COVID-19 victim console each other during cremation in Jammu, India, April 25, 2021. 
Pic Credit: Channi Anand/AP

2nd wave India
People cremate the body of a COVID-19 victim at a crematorium ground in New Delhi, April 24, 2021.
Pic Credit: Danish Siddiqui/Reuters

Corona Virus in 2021
New bodies arrive at a mass cremation site in Delhi, April 23, 2021.
Pic Credit: Atul Loke/The New York Times/Redux Pictures

Oxygen Shortage in India
A man receives oxygen in a vehicle at a Sikh gurdwara (temple) in Delhi, April 25, 2021.
Pic Credit: Atul Loke/The New York Times/Redux Pictures

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Monday, March 29, 2021

रामायण से सीख

Ramayan
रामायण

 आज ही के दिन पिछले वर्ष लॉकडाउन में दूरदर्शन पर जनता की फरमाइस पर रामायण का प्रसारण शुरू हुआ था। पूरे देश में, देश के हर राज्य में, हर मोहल्ले में, हर गली में, कहीं कहीं तो विदेशो में भी लोगो ने बढ़ चढ़ कर इसे देखा, पूरे परिवार के साथ बैठ कर देखा। बल्कि देखा ही नही, इस पल को सबने मिलकर जिया। इस रामायण प्रसारण के जिस दिन रावण मरा था, लोगो ने उस दिन एक दूसरे को दशहरा की बधाई दी थी।  6 करोड टेलीविजन पर रामायण को एक साथ देखा जाता था। रामायण का हर एक सीन हर एक किरदार कुछ ना कुछ सीखाता है। 


Ramayan
भगवान श्री राम जी


उसमे दो सीन है जिसने मुझे सोचने पे मजबूर कर दिया था। पहला सीन जिसमे महाराज दशरथ जी बिस्तर पे लेटे हुए हैं, बुरी तरीक़े से रो रहे है, और सिसक सिसक के कह रहे होते हैं, राम........मेरा राम। वो अपने राम की याद में अधमरे से हो गए है। क्या आदमियों को ऐसे सबके सामने अपना दुःख दिखाने का हक़ होता है? मतलब मुझे शायद सालों हो गए रोये हुए, हाँ बीच में कभी बुरा लगा होगा। पर प्रॉब्लम पता है क्या है? ये बात कि मुझे बुरा लग रहा है। मैंने मोबाइल उठा के देखा होगा कि किसे फ़ोन मिलाएं, किसी को मिलाया भी होगा पर उससे ये नहीं कहा होगा कि यार मुझे बुरा लग रहा है। क्यों? क्योंकि शायद वो मुझे judge करेगा।


Ramayan
महाराज दशरथ जी भगवान श्री राम की याद में विलाप करते हुए


उस दिन श्री राम जी की माँ कौशल्या जी महाराज दशरथ जी से कहती हैं कि "मैं माँ हूँ, पर मैंने फिर भी धीरज नहीं छोड़ा, देखिएगा एक दिन हमारा राम वापस आएगा।" और शायद उस वक़्त को याद करके दशरथ जी फिर से बस इतना कह पाते हैं, राम.....मेरा राम। एक सूर्यवंशी सम्राट, महापराक्रमी योद्धा, असंख्य प्रजा जिनको भगवान् की तरह मानती थी वो इस दुःख में रो रहे थे कि उनका बेटा उन्हें छोड़ के चला गया। वजह चाहें जो भी हो, पर क्या उनका ऐसे रोना सही था या गलत? सवाल बस यही है।


Ramayan
महाराज दशरथ जी


एक बार ये सवाल खुद से पूछियेगा और जवाब ढूंढ़ियेगा। रोना सही है या गलत?


अब दूसरे सीन के बारे में बताता हूं। 


Ramayan
भगवान श्री राम जी


जब भगवान श्री राम जी को पता चलता है कि राजा दशरथ जी नहीं रहे तो वो भी सहन नही कर पाते है, और रोने लगते हैं। उनकी आँखों में मोती से आंशु, रामायण में सिर्फ इसी दृश्य में दिखते है, वो भी इतना मार्मिक। उनको रोते देख ऋषि वशिस्ट जी तब उनसे एक बहुत ही बड़ी बात बोलते हैं, ध्यान से पढ़ियेगा और समझियेगा, वो कहते हैं कि "ये मिलना बिछड़ना तो अनिवार्य होता है, बुद्धिमान इसका शोक नहीं करते हैं।" बहुत ही ज़बरदस्त लाइन है ये। एक ही लाइन में बहुत से सवालो के उत्तर है। शायद महान और आम लोगों की समझ के बीच बस इसी लाइन का फरक होता है। मतलब रामायण में भगवान श्री राम जी भी रोते हैं, लक्ष्मण जी भी रोते हैं। यहाँ तक की इंद्रजीत के मरने पर जिसे महाज्ञानी कहा जाता था, वो रावण भी रोता है। विभीषण के बिना शायद रावण को मार पाना कठिन था, मगर फिर भी रावण के मरने पर वो भी रोया था। शायद इसीलिए मेरे हिसाब से रोना गलत बात नहीं है, गलत बात है रोते रहना...!


Copyright Disclaimer:

  • All Images, which used in this Article are from the Doordarshan's Ramayan, Directed by Ramanand Sagar.
  • इस लेख में दिखने वाली तस्वीर दूरदर्शन की रामायण की है, जिसके निर्देशक रामानंद सागर जी है

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Saturday, March 13, 2021

रहस्य

 

Horror
रहस्यमयी सड़क


WARNING: Reader's discretion is advised, should not be read by anyone under the age of 16.


रात के 2 बज रहे हो, आप घर में अकेले हो, अचानक आपका घर का गेट कोई खटखटाता है और आपको पता है कि कोई आने वाला नही है, तो आप दरवाजा खोलेंगे या नही? आप जब भी भूत प्रेत के बारे में सुनते है तो आपके दिमाग में सफेद साड़ी और सफेद बालों वाली औरत, ठंड की वो काली रात, पायल की आवाज, किसी के रोने की आवाज, कब्रिस्तान का दृश्य, ये सब आपके दिमाग मे जरूर आता होगा। मैं जब भी भूतो के बारे में लिखता हूं तो मुझे खुद कभी कभी डर लगता है। मुझे Subconscious mind की वजह से लगता है की जिसके बारे में मैं लिख रहा हु वो मेरे कमरे में खड़ा है, मुड़ के देखता हूं तो कमरे के शीशे, हिलते हुए पर्दो के अलावा कुछ नही दिखता।


डर ही डर को पैदा करता है, कहते है जिस रास्ते के बारे में ना पता हो उस पर कभी नही जाना चाहिए, कभी भी नही। सालो पहले की बात है, एक आदमी देर रात अपने घर जा रहा था। हाईवे की तरफ वो जा रहा था तभी उसे एक कच्चा रास्ता दिखता है। उसे लगा इस रास्ते से वो हाइवे पे जल्दी पहुच जाएगा, उसने तुरंत अपनी बाइक उस कच्चे रास्ते पे मोड़ ली और यहीं उसने सबसे बड़ी गलती कर दी। थोड़ी दूर चलने के बाद एक ऐसी जगह आती है जहां बाइक की रोशनी के अलावा और कोई रोशनी नही थी। कहते है कि बुरी शक्तियां अंधेरे में अपने चरम पर होती है। वो बार बार अपनी घड़ी में समय देख रहा था। वो समझ चुका था कि ये रास्ता सही नही है। वो पसीने में लत पत तेजी से अपनी बाइक भागा रहा था। आचानक उसे कोई आवाज सुनाई देती है, जैसे लगता है उसे कोई बुला रहा है। वो ना चाहते हुए भी बाइक अचानक रोकता है। उसे वहाँ बड़ी अजीब सी चीज दिखाई देती है। कहते है आप कहीं जा रहे हो और आपको कुछ अजीब सी चीज दिखाई दे तो उसे टोकना नही चाहिए। वो आदमी जब सहम के आगे बढ़ता है तो देखता है एक औरत वहां खड़ी है। सबसे अजीब बात वो तो उस औरत को देख रहा है मगर वो औरत उसे नही देख रही, मतलब वो औरत सीधे देख रही है, सड़क के दूसरी ओर। पूरा अंधेरा, सुनसान जगह, आधी रात का वक़्त और वो औरत! आँखों मे डर, माथे पर सिकन। वो अपना थूख भी नही घोट पा रहा है। पसीने में लथ पथ अपनी आवाज भी नही निकाल पा रहा, ना कदम आगे बढ़ रहे है ना ही पीछे। वो औरत धीरे धीरे नजदीक आ रही है, नजदीक और नजदीक। अब जो वो देखता है उसे देख के उसका शरीर ठंडा पड़ जाता है, आँखें झपकना बन्द कर देती है, मुह खुला का खुला है। वो चीज़ देख मानो उसके होश उड़ गए है।


सालों पहले एक लड़की हुआ करती थी Anneliese Michel, सोलह साल की उम्र आते आते उसे हवा में अजीब अजीब आकृतियां दिखने लगीं, वो आत्माएं उसे उसका नाम ले के अपने पास बुलाती थीं, पास आओ मेरे, आओ मेरे साथ, Anneliese ज़ोर ज़ोर से चिलाने लगती थी, रोने लगती थी पर उसके अलावा ना तो वो आत्माएं किसी को दिखाई देती थीं, ना तो सुनाई देती थीं। Anneliese के माँ बाप ने उसका बहुत इलाज करवाया पर दिन बा दिन उसकी हरकतें और अजीब होती चली गयीं, वो रात में एकदम से उठ के खिड़की के बाहर कुछ देखने लगती थी, खिड़की के बाहर बस एक बड़ा सा पेड़ था, सड़क पे कोई भी नहीं, कभी कभी वो एकदम ठीक हो जाती थी और कभी कभी डर के मारे अपने पैर तक ज़मीन पे नहीं रखती थी, उसे लगता था जैसे ही वो अपने पैर ज़मीन पे रखेगी कोई उसे पकड़ लेगा। तेईस साल कई उम्र में उसकी मौत हो जाती है, मरने से कुछ दिन पहले तक उसे लगता था कि उसके कमरे से उस पेड़ की दूरी कम हो रही है, अब वो हर रात खुद को शीशे में देखकर पता नहीं किससे कहती थी, आओ मेरे पास, पास आओ। इस हालत में आते आते उसके माँ बाप को भी पता चल चुका था कि Anneliese possessed है, उन्होंने उसकी दवाइयां बंद करवा दी और church से priests बुलवाये, Anneliese उन priests को देखते ही चिल्लाने लगती थी, गन्दी गन्दी गालियां देने लगती थी, रोने लगती थी और एक दिन वही हुआ जिसका डर था, 1 July 1976 को Anneliese Michel की अपने ही घर में मौत हों जाती है। वो सिर्फ 30 किलो की थी जिस दिन उसकी मौत हुई, डॉक्टरों ने कई साइंटिफिक theories दीं कि आखिर में dyhradation की वजह से Anneliese की मौत हुई पर आजतक किसी को ये पता नहीं चला कि क्या उसे सच में उस पेड़ पे आत्माएं दिखती थीं? इनफैक्ट Anneliese Michel की कहानी इस दुनिया की सबसे रहस्यमयी कहानियों में से एक है। हालांकि बाद में Priest और Anneliese के माँ बाप को 6 माह की सजा हुई, Negligent Homicide के लिए। पढियेगा कभी Anneliese के बारे में गूगल, विकिपीडिया सब पर है। इन्फेक्ट इसके ऊपर कुछ फ़िल्म और बनी है।


रात के साढ़े तीन बजे वो आदमी बाइक पे जिस परछाई को एक औरत समझ रहा था वो कोई औरत नहीं बल्कि एक आदमी का कटा हुआ सर था जो एक खंडर की दीवार पे रखा हुआ था। ये देख के उस आदमी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और पता है इससे भी ज़्यादा डरावनी बात क्या हुई थी उस रात, उस कटे हुए सर के ठीक बीच में एक बड़ा सा लाल रंग का टीका लगा हुआ है जो अभी भी उसकी नाक से नीचे गिर रहा है।


पता है, अगर आपको वजह पता चल जाए ना कि ये इस वजह से हुआ है, जैसे रात में घंटी बजी तो आपको पता हो कि कोई आने वाला था तो आपको उतना डर नहीं लगेगा। पर इस कहानी की सबसे अजीब बात ये थी कि पुलिस को आजतक पता नहीं चला कि वो सर किसका था। किसने मारा उसे ये आजतक किसी को पता नहीं चला और यही बात तो डर पैदा करती है। जो कहानियां कभी ख़तम नहीं हो पाती उनका अंत अपने दिमाग में सोच सोचकर डर लगने लगता है। Anneliese Michel को क्या सच में भूत दिखते थे। उसकी तस्वीर देखेंगे तो शायद आप भी सोचने लगेंगे, उस पेड़ में उसे क्या दिखता था? वैसे भी उसकी कहानी को दुनिया की सबसे रहस्यमयी कहानियों में गिना जाता है....!


From this story, I am not promoting any type of Superstitions. The purpose of this story is only for entertainment purpose nothing else.

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Thursday, November 19, 2020

छठ महा त्यौहार

Chhath Puja
Chhath Puja


उगते सूर्य की उपासना तो करे पूरा संसार,

डूबते सूर्य की उपासना करें सिर्फ बिहार।

ये है हमारे मिथिलांचल के संस्कार,

जिसके लिए हम रहते बेकरार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर,

उगते सूर्य का करे इंतज़ार।

रात के घोर अंधकार में ही,

पहुच जाए घाट पर कर पूरा श्रृंगार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


वक़्त के साथ बदले है हर त्यौहार,

वक़्त ने बदले संस्कृति और संस्कार।

मगर छू ना पाया हमारा ये त्यौहार,

प्रकृति से ही है इसकी रौनक हर बार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


बर्षो से जो बेटे रहते बहार,

इस दिन मिलेंगे वो माँ के द्वार।

पूरे वर्ष कहीं भी रहे परिवार,

छठ पर्व पर एकत्रित होगा पूरा परिवार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


मिट्टी के चूल्हे हम बनाते,

शुद्धता का पूरा ध्यान है रखते।

गोबर से नीपते घर और द्वार,

हाथ से हाथ मिला काम करता पूरा परिवार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


छत पर गेहूं सुखाने से लेकर,

घाट तक दौरा उठाना नंगे पैर।

पोखर हो या हो नदियों की धार,

लगता हर वर्ष श्रद्धालुओं का अंबार।।

ये है हमारा छठ महा त्यौहार।।


Nitish Kumar

नितीश कुमार


जय छठी मैया🙏


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Wednesday, November 4, 2020

Baba Ka Dhaba

 

Baba Ka Dhaba

बचपन में सुदर्शन जी की एक कहानी पढ़ी थी "हार की जीत"। शायद आपने भी पढ़ी होगी। इसमें तीन पात्र होते है बाबा भारती, डाकू खड़ग सिंह और बाबा भारती का एक बहुत ताकतवर और सुंदर घोड़ा-'सुल्तान'। बाबा भारती को सुल्तान बहुत प्रिय होता है। एक दिन खड़ग सिंह बाबा भारती से मिलने उनकी कुटिया में आता है। बातों बातों  में अचानक उसकी नजर सुल्तान पर पड़ती है। एक नजर में खड़ग सिंह को सुलतान आकर्षित लग जाता है, सुल्तान था ही इतना प्यारा। उसने बाबा भारती से सुल्तान के बारे में पूछा। बाबा भारती ने भी बड़े गर्व के साथ अपने सुल्तान के गुणों को सुनाने लगे। जाते जाते खड़ग सिंह बाबा भारती से कहता है कि ये घोड़ा तो मैं लेकर ही रहूगा। बाबा भारती डर जाते है और घोड़े की निगरानी तेज कर देते है।


एक दिन बाबा भारती अपने सुल्तान के संग कहीं जा रहे थे। अचानक रास्ते में उन्हें एक दिव्यांग मिलता है। वो बाबा भारती से आगे के सफर के लिए मदद मांगता है। बाबा भारती एक संत आदमी मदद से पीछे कैसे हट जाते? वो तुरंत नीचे उतर कर दिव्यांग को उठा कर सुल्तान पे बैठा दिया। सुल्तान पे बैठते ही उसने सुल्तान की लगाम थामी और हवा की तरह सुल्तान को भगा ले गया। वो दिव्यांग और कोई नही डाकू सुल्तान सिंह ही था। बाबा भारती ने बहुत कोशिश की मगर वो खड़ग सिंह को नही रोक पाए। आखिर में बाबा भारती ने पीछे से उसे चिल्ला कर कहा "खड़ग सिंह इस घटना का जिक्र किसी से मत करना, नही तो लोग जरूरतमंद की मदद करना बंद कर देंगे।"


ये बात डाकू के दिल मे बैठ गयी। दिन रात बस यही शब्द उसके कानो में गूंजने लगें। आखिर में उतने सुल्तान को लौटाने का निर्णय लिया और रात के अंधेरे में सुल्तान को बाबा भारती के कुटिया के सामने बांद के चले गया। सुबह जब बाबा भारती ने सुल्तान को अपनी आँखों के सामने देखा तो खुशी के मारे वो फुट फुट लगे और सुल्तान को गले से लगा लिए। 


लेकिन, ये कहानी आज ही क्यों? शायद आप समझ गए होंगे। आज हम सबके सामने भी बिल्कुल यही कहानी है, बस पात्र अलग है। बाबा भारती के शब्दों ने खड़ग सिंह का ह्रदय परिभर्तन तो कर दिया मगर आज क्या?


एक यूटुबर को क्या जरूरत की कोई किस हालात में है। लेकीन उसने देखा कि एक बुजुर्ग बाबा का ढाबा चला रहा है और आर्थिक परेशानी से जूझ रहा है। बंदे ने एक वीडियो बनाई और लोगो से विनती कि की आप सब बाबा के ढाबे पे आकर भोजन कीजिए और इन दंपति की मदद कीजिए। रातों रात वीडियो वायरल होती है। अगले दिन बाबा का ढाबा के सामने हुजूम आ जाता है। एक रात में बाबा की जिंदगी बदल जाती है। अतः सब अच्छा होता है। लोगो ने इंसानियत देखी, किस्मत बदलते देखा। देश को एक नई रहा मिली, मदद की रहा, मतलब जब हो पाए लोगो की मदद करे। लेकिन अचानक एक खबर आती है कि उसी बाबा ने उसी यूटुबर पर केस कर दिया। कुछ फण्ड का मामला है। कुछ दिन पहले बाबा रो रहा था तब यूटूबर ने उसे नई जिंदगी दी, आज बाबा ने केस किया तो बन्दा रो रहा है। वक़्त बड़ी जल्दी बदल जाता है ना? खैर कौन सही है और कौन गलत वो तो पता चल ही जाएगा। लेकिन एक सवाल उठता है जो लोगो मे कुछ मदद की भावना आयी थी वो क्या रह पाएगी? क्या अब मदद करते वक़्त लोगो के दिल मे ये घटना नही आएगी? क्या अब कोई निडर होकर मदद कर पाएगा? सवाल तो बहुत है मग़र जवाब नही है! मैं बस इतना बोलूंगा अगर आप सही है तो एक दिन ये बात सबको पता चलेगी ही।


नीतीश कुमार

Nitish Kumar


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Disclaimer: This article is personal view of Nitish Kumar, from this we are not supporting and defaming any Person(s) in the case of Baba Ka Dhaba.

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Saturday, October 3, 2020

सवाल पूछिए।

पूछिए सवाल
Ask Questions!

Today, I am trying to highlight such a serious topic. But before starting, it is also very important to clarify that it is written not to hurt someone's feelings but to give a message to the society.


कुछ दिन पहले लॉकडाउन में महाभारत देखी थी। उसमे द्रौपदी का चीर हरण का एक दृश्य आता है। मैंने इसके बारे में बहुत बार पहले सुना था, मगर कभी ये दृश्य या महाभारत नही देखी थी। हमेशा सोचा करता था कि उस जमाने मे भी भगवान श्री कृष्ण के अलावा ऐसा कोई नही था जो ये अनर्थ होने से रोकता। और सबसे बड़ा सवाल ऐसा हुआ ही क्यों? इसका जवाब मुझे महाभारत देखने के बाद मिला। जरा याद करिए वो सीन, एक कुल वधू वो भी ऐसे राज घराने की जिसके बारे में जितना बताया जाए कम है। उसे सभा गृह में बालों से खींच कर लाया जाता है। जिस सभा गृह में पितामह भीष्म, महाराज धृतराष्ट्र, गुरुवर द्रोणाचार्य, गुरुवर कृपाचार्य और महात्मा विदुर जैसे  विराट व्यक्तित्व के नाजाने कितने आदरणीय और सम्माननीय लोग उपस्थित थे। अगर आप इन सभी को नही जानते मतलब आपने महाभारत नही देखी। कभी फुर्सत से देखना वक़्त लगेगा मगर जरूर देखना। हर किरदार आपको कुछ सीख देगा जो शायद आपको और कोई ना दे पाए। आपने लॉकडाउन में महाभारत और रामायण ना देख कर बहुत बड़ी गलती की, एक सुनहरा मौका मिला था जिसे अपने हाथ से जाने दिया। मुझे खुद देखने के बाद अफसोस हुआ कि मैंने इसे देखने मे इतना वक़्त क्यों लगा दिया, बहुत पहले देख लेना चाहिए था। खैर, सवाल उठता है कि इस चीर हरण में गलती किसकी थी? द्रोपदी की? जो इन सब से अनजान अपने पांचाल देश को अपने प्रिय माता पिता को छोड़ हस्तिनापुर राजघराने की बहू के रूप में आयी थी। बड़े आदर-सम्मान के साथ उस परिवार में आयी थी, जिस परिवार के सामने उसे वो सब सहना पड़ा जिसे सुन कर ही रूह कांप जाए। पांडवो की? कौरवो की? या उस सभा गृह में उपस्थित प्रशिक्षित लोगो की? पूछिए ये सवाल अपने आप से अपने इतिहास से की किसकी गलती थी। मेरी नजर में ये गलती थी सभा गृह में बैठे महान लोगो की जो हस्तिनापुर जितना विराट राज्य तो बर्षो से चला रहे थे, मगर उस दिन किसी के जुबान पर एक भी सवाल नही आए कि "ये क्यों हो रहा है?", "ये ठीक नही हो रहा"। मैं ये नही कहा रहा कि कौरवो की गलती नही थी, जिन्होंने अपनी माँ समान भाभी के साथ ये हरकत की। कौरवो से ज्यादा तो सिर झुकाए वहां बैठे धर्मराज युधिष्ठिर और उनके भाइयो की थी जिन्होंने अपने अहंकार में एक स्वंतत्र स्त्री के आत्मसम्मान को दो कौड़ी के खेल में दांव पर लगा दिया। ये अधिकार उन्हें किसने दिया? यही संस्कार मिले थे उन्हें? लेकिन सबसे बड़ी गलती थी वहां बैठे और लोगो की। क्यों किसी ने इसका विरोध नही किया? सवाल नही किया? किसी ने भी एक शब्द अपनी जुबान से क्यों नही बोला? मुझे ख़ुशी हुई कि वहां एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने खड़े होकर महाराज धृतराष्ट्र से सवाल किया "सिंहासन के प्रति मेरी पूरी निष्ठा है, मैं आपका आदर करता हूं लेकिन मैं ये सवाल जरूर करुगा की महाराज! ये हो क्या रहा है"। मैं सम्मान करता हूं ऐसी इंसानियत रखने वाले विदुर जी का। मैं सम्मान करता हूं विकर्ण जी का, जो थे तो कौरव लेकिन उस दिन उन्होंने इसका खुल कर विरोध किया था। मैं सममान करता हूं द्रौपदी को, जिनकी वाणी और सवालो ने पूरे भवन को हिला दिया था।

द्रौपदी के लिए तो कुरुक्षेत्र में महाभारत हो गयी थी। मगर आज क्या?

अफसोस द्वापरयुग जैसा विदुर कलयुग में ना के बराबर है। हम सब को विदुर बनना पड़ेगा। सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करना पड़ेगा कि ये हो क्या रहा है? हमें सवाल पूछना पड़ेगा BJP से, BJP के प्रभक्ताओ से, BJP के नेताओ से कि क्यों महाराष्ट्र के किसी विषय को इतनी गंभीरता से लिया जाता है? राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ कि किसी घटना पर चिंता होती है और न्याय मांगते है। लेकिन वैसी ही घटना उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, बिहार जैसे राज्यो पर चुप्पी साध लेते है। क्यों आपके प्रदेश के किसी घटना पर न्याय दिलाना आपका काम नही है? सिर्फ न्याय मांगना ही आपका काम है? हमे सवाल पूछना चाहिए कांग्रेस से, क्यों उत्तर प्रदेश के एक घटना पर आपको इतनी फिक्र है मगर आपके महाराष्ट्र में क्या हो रहा है आपको उसकी खबर नही? हमे सवाल पूछना चाहिए हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से कि जो वादे अपने किये थे वो वादे कहाँ गए? हमे सवाल पूछना चाहिए योगी आदित्यनाथ जी से कि जिन मुद्दों से परेशान हो कर आपको जीताया, ये सोच कर की अब तो हमारी कोई सुनेगा। लेकिन 3 साल बाद भी रोजाना आपके द्वार पर कोई इंसाफ के लिए हाथ फैला कर खड़ा क्यों हो जाता है? हमें सवाल पूछना चाहिए राहुल गांधी जी और सोनिया गांधी जी से कि आपकी सत्ता में 2 साल तक क्यों गुनहगारों को तारीख पर तारीख मिलती रही? हमे सवाल पूछना चाहिए अरविंद केजरीवाल जी से कि क्या सोच कर आपने गुनहगार को सिलाई मशीन दी थी? संसद में बैठी महिलाओं से सवाल पूछना चाहिए कि क्यों कुछ चुने हुए मुद्दों पर ही उनकी ज़ुबान खुलती है? महिला होकर महिला का दर्द भी पार्टी और जगह देख कर समझा जाएगा? बताइए स्मृति ईरानी जी और जया बच्चन जी। सवाल पूछिए अखिलेश यादव जी से, शिवराज सिंह चौहान जी से, उद्धव ठाकरे जी से, पूछिए सवाल हर एक नेता से की क्यों हर मुद्दों को राजनीति की नजरिये से देखा जाता है। क्या हमारे राजनेताओ में इंसानियत मर चुकी है? पार्टी के नेताओं को भी विकर्ण बन कर अपने साथियों से सवाल पूछना चाहिए कि ये क्या हो रहा है? टैग करके पूछिए नेताओ से प्रसाशन से हर एक सवाल। कितने दिन तक चुप रहेंगे, हर 5 साल में हमारे ही द्वार पर मिलेंगे।

हमें सवाल पूछना चाहिए हमारे पत्रकारों से क्यों कुछ मुद्दों पर ही आपके डिबेट चलते है? क्यों खबरें भी अपनी पसंदीदा सरकारों से ही पूछ कर चलाई जाती है? एक सवाल पूछिए अपने आप से क्यों ये हमारे अगल-बगल हो रहा है? हमारे समाज में क्यों हो रहा है? याद रखिए सिर्फ स्टेटस डाल देने से कुछ ठीक नही होने वाला। एक बार सोचिए और पूछिये खुद से एक सवाल कि कितनो को हमने गलत करने पर टोका है? राम राज्य में बहने सुरक्षित नही है बोलने से पहले खुद राम बनना पड़ेगा। 33 करोड़ लोग साथ आए थे तो हमे आजादी मिली थी, तो सोचिए 137 करोड़ लोग जब साथ आएंगे तब क्या-क्या बदल सकता है। मगर हमें हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मज्जिद, BJP-Congress जैसे विषयों से फुर्सत मिले तब ना।

We are not Supporter, We are Voter!

नितीश कुमार

Nitish Kumar

Follow us on Instagram @hindi__poetry 

Disclaimer: This article is personal view of Nitish Kumar with the help of Kumar Vishwas's video of September 30, 2020 on his official youtube channel, from this we are not supporting and defaming any political leader and political party.

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Tuesday, July 7, 2020

लॉकडाउन में प्रकृति की सुंदरता।

Beauty of nature in lockdown
River Yamuna in Delhi during Lockdown

इंसानो को जब से घरों में बैठाया है!


इंसानो को जब से घरों में बैठाया है,
तुम देखो तो कितना बदलाव आया है।

हर प्राणी देखो तो अब शुद्ध सांस ले पाया है,
कार्बन कम ऑक्सिजन को ज्यादा पाया है।
लॉकडाउन ने देखो तो प्रदूषण को घटाया है,
जहरीली हवाओ को अब हमने विलुप्त पाया है।।

परिंदों ने देखो अब खुला आसमां पाया है,
कितने सालो बाद हमने उन्हें चहकता पाया है।
लॉकडाउन हमारे लिए एक संदेश लाया है,
पर्यावरण का असली रूप हमारे सामने लाया है।।

इंसानो को जब से घरों में बैठाया है,
तुम देखो तो कितना बदलाव आया है।

नदियों में देखो कितना निर्मल पानी आया है,
कितने सालो बाद फिर गंगा में अमृत आया है।
लॉकडाउन ने बर्षो की समस्या को सुलझाया है,
गंगा जल को फिर से अब पीने लायक बनाया है।।

दिल्ली के आसमां में देखो तो दो इन्द्रधनुष नजर आया है,
गंदा नाला बानी यमुना में हमे फिर से जल नजर आया है।
लॉकडाउन में गाड़ी से भरी सड़को को हमने सुनसान पाया है,
उन सड़को पर अब हमने पक्षियों को बैठते और पानी पीते पाया है।।

इंसानो को जब से घरों में बैठाया है,
तुम देखो तो कितना बदलाव आया है।

चारों और देखो तो क्या खूब सन्नाटा छाया है,
प्रकृति की मधुर आवाजों को हमने कानों में पाया है।
लॉकडाउन ने हमे पर्यावरण से मिलवाया है,
सफेद आसमां अब नीला अंबर में बदल आया है।।

चांदनी रात में देखो तो फिर तारों का समुंदर नजर आया है,
बारिश की बूंदों में हमने फिर मिट्टी की खुशबू को पाया है।
लॉकडाउन पर्यावरण के लिए एक वरदान बन आया है,
पीढ़ियों बाद हमने फिर प्रकृति को जीवित होते पाया है।।

इंसानो को जब से घरों में बैठाया है,
तुम देखो तो कितना बदलाव आया है।

Nitish Kumar

नीतीश कुमार



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Sunday, June 14, 2020

Sushant Singh Rajput

Sushant singh rajput
Sushant Singh Rajput

पता है, आपको बिल्कुल भी पता नही चलेगा कि कुछ लोग अंदर से कितने टूटे हुए होते है। अगर वो आपको आ कर बोलेगे न कि "मैं अंदर से टूटा हुआ हूं" तो आप यकीन नहीं करेंगे। उनका स्वभाव ही कुछ ऐसा होता है की सामने वाला यकीन ही नही कर सकता, कि इतने हँसमुख इंसान को भी कोई तकलीफ होगी। कोई बात उसे अंदर से दीमक की तरह खाई जा रही होगी। आपको हर समस्या में समझाने वाले इंसान को कभी कोई समझने वाला नही मिलता होगा। वो शायद आपको बोलते भी होंगे कि "यार मुझे ये परेशानी है", "मैं इसलिए परेशान हूं" आप हंस कर टाल देते होंगे कि सबको परेशानी से निकालने वाले को आखिर किस बात की परेशानी होगी? या आप सच भी मानते होंगे तो ये सोच कर कुछ नही करते होंगे कि "ये तो इतना समझदार है खुद को संभाल लेगा" लेकिन सच्चाई ये है कि उन्हें भी किसी के साथ की, किसी से खुल कर बात की जरूरत होती है।

कहते है जाने वाले को हम रोक नही सकते लेकिन इस परिस्थिति में हम जाने वाले को बिल्कुल रोक सकते है। बस आप अपने जानकारों से रोजाना बात करिए। उन्हें समझने की कोशिश करिए उनसे खुल कर पूछिए की "कोई तकलीफ तो नही?" फॉर्मेलिटी के लिए नही सच में दिल से पूछिए। अगर वो कोई बात शेयर करते है तो आराम से उसे समझे और फिर उसे समझाइए। आप नही समझा सकते तो किसी और को बोलिए लेकिन चुप बिल्कुल भी मत बैठिए। आपका एक चुप किसी को जिंदगी भर के लिए चुप करवा सकता है। सबसे जरूरी की आप कुछ भी करने और बोलने से पहले कई बार सोचे कि आपका एक कदम किसी के दिल को ठेस तो नही पहुचा देगा। आपके लिए वो बहुत छोटी बात होगी लेकिन सामने वाले के लिए वो बहुत बड़ी बात हो जाती है। शायद इतनी बड़ी की हमे फिर से वो देखने को मिल जाए जो आज मिला है। मैं हमेशा कहता हूं अपने आप को सामने वाले कि जगह रख कर देखो की उसने ऐसा क्यों किया या बोला अगर मैं उसकी जगह होता तो क्या करता या बोलता। जिस दिन आप खुद को सामने वाले कि जगह रखना सीख जाएंगे ना उस दिन आपकी आधी समस्या खुद हल हो जाएगी।

जरा सोच कर देखिए कि कितने अजीब हो गए हैं हम सब। हमारे बीच एक व्यक्ति मुश्किल में होता है। अंदर से बुरी तरह से टूट रहा होता है। ज़िंदगी से हार रहा होता है। खुद से निराश हो रहा होता है। मौत के करीब जा रहा होता है और हमारी संवेदना तब जागती है जब वो हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चले जाता है। काश! मुश्किल में घिरे सुशांत सिंह जी को उनका कोई साथी हिम्मत देकर बचा पाता।

बिहार के पटना जैसे छोटे शहर से मुम्बई तक का सफर हर कोई पूरा नही कर पता। 2003 में DCE एंट्रेंस एग्जाम में AIR 7 लाना कितनी बड़ी बात है आप इससे समझ पाएंगे कि नॉन मेडिकल स्टूडेंट का इकलौता यही सपना होता है कि 10,000 रैंक भी आ जाए तो जिंदगी बन जाएगी। नेशन ओलिंपियाड फिजिक्स में टॉप करना, ये तो स्टूडेंट के सपने से भी बहुत दूर होता है। स्टूडेंट एक एग्जाम क्लियर करने की चाह रखते है इन्होंने 1 नही 2 नही पूरे 11 इंजीनियरिंग के एग्जाम क्लियर किए। अब आप सोच सकते है एक्टर के साथ साथ ये कितने अच्छे अच्छे स्टूडेंट भी थे।

आपके बहुत से डायलाग आज भी बहुतो को प्रेरणा देते है और देते रहेंगे!

मैं जब भी " M S Dhoni - The Untold Story " देखूंगा तो आपको अपने सामने जिंदा पाउगा। कुछ लोगो के काम इतने अच्छे होते है कि वो अमर रहा जाते है....

💐💐🌼🌼🌼🌼🌼💐💐
🙏🙏भावपूर्ण श्रदांजलि🙏🙏


We will miss you SUSHANT SINGH RAJPUT Sir


Sushant Singh Rajput rose to become a prominent actor due to his talent. A young actor, who excelled in his roles, gone too soon.. May the departed soul Rest in peace and God give strength to his family, friends & fans to bear this loss.

Note: We are not saying and supporting that Sushant Singh Rajput committed suicide, this article is based on initial report of June 14, 2021 from Media. Main purpose of this article is to increase awareness in our society.

धन्यवाद
Thank you

नितीश कुमार
Nitish Kumar

Sunday, May 31, 2020

कोरोना वायरस से कैसे बचें?


Covid 19
Covid-19

कल (1 जून 2020) से लॉकडॉन-5 (अनलॉक-1) शुरू हो रहा है। जिसमें लग भग सब कुछ खुल रहा है। इसका मतलब ये नही की अब आप घूमना फिरना शुरू कर दो। ये सब कुछ बस इसलिए खोला जा रहा है कि लोगो की आर्थिक स्थिति ठीक हो पाए। याद रहे कोरोना खत्म नही हुआ है, ये अब और तेजी से बढ़ रहा है। तो बस पैसे कमाने, काम करने और जरूरी चीज़ों के लिए ही घर से बाहर निकले। इसे मजाक में या हल्के में ना ले। आप अपनी जिंदगी अपने परिवार की जिन्दगी के लिए और देश के लिए घर पे ही रहे। वेवजह बिल्कुल भी घर से ना निकले। अगर कुछ महीने आप घर पर बैठ जाएंगे तो फिर से आप जिंदगी भर घूम सकते हैं मौज-मस्ती कर सकते हैं।

युवाओं के लिए एक जरुरी संदेश।

आपके पेरेंट्स अपनी जान जोखिम में डाल कर आप के लिए पैसे कमाने घर
से बाहर निकलेंगे तो आप वेवजह घर स बाहर निकल कर खुद की उनकी जान जोखिम में मत डाल देना।
जिन यार दोस्तो से आप मिलने जाओगे न, अगर भगवान ना करें आपको कोरोना हो गया ना तो उसके बाद वही यार दोस्त आपको नजर भी नही आएंगे।

कोरोना वायरस (कोविड - 19) से कैसे बचें?


जब भी आप जरूरी कामों के लिए घर बाहर जाए तो इन बातों को हमेशा ख्याल रखे और इसका पालन करें। ये आपको कोरोना वायरस (Covid-19) से बहुत हद तक कोरोना वायरस से बचा सकता है।

S - Social Distancing (समाजिक दूरी)

M - Mask (मास्क)

S - Sanitizer / Soap (सैनिटाइजर / साबुन)


Social Distancing (समाजिक दूरी)

जब भी आप घर से बाहर जाए तो सबसे जरूरी है कि सामाजिक दूरी का हर पल हर जगह हर क्षण खयाल रखें। हमेशा लोगो से कम से कम 6 फ़ीट (2 गज़) की दूरी बना कर रखे। किसी भी जगह किसी भी हालत में ये 2 गज की दूरी को कम नही होने देना है। किसी भी ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में ना आए जिन्हें कोरोना के लक्षण (जैसे बुखार और खांसी) है। 

Mask (मास्क)

मास्क को अब अपने शरीर का ही एक हिस्सा मानना है। हमेशा मास्क पहन कर रहे। बार बार मास्क को छुए नही। मास्क के रूप में आप खुद का कपड़े (3 लेयर वाला) वाला मास्क भी प्रयोग कर सकते है। कपड़ा या रुमाल को मास्क की जगह प्रयोग करते वक़्त आप इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखे कि जो हिस्सा आपने पहली बार कपड़े/रुमाल का बाहर की तरफ रखा था उसे हर बार बाहर की तरफ ही रखे। दूसरों के मास्क का प्रयोग ना करें। मास्क को रोजाना धो ले या बदल ले।

Sanitizer / Soap (सेनिटाइजर / साबुन)

दिन में बार बार सैनिटाइजर या साबुन से हाथ धोते रहे है। सेनिटाइजर का प्रयोग करते वक़्त आप सेनिटाइजर हाथ मे लेने के बाद सेनिटाइजर की बोतल को रख दे उसके बाद ही हाथ मे सेनिटाइजर लगाए, याद रहे सैनिटाइजर लगाने के बाद सैनिटाइजर की बोतल को आप न छुए या सेनिटाइजर की बोतल पर सेनिटाइजर लगा कर उसे भी डिसइन्फेक्ट(disinfect) करे। साबुन से बार बार 20 सेकंड तक हाथ धोए और हाथ धोते वक़्त अपने नल को भी साफ कर दे ताकि आपके नल पर कीटाणु ना रह जाए।

पानी की बोतल

घर से निकले से पहले अपने साथ अपनी पानी की बोतल में पानी लेना ना भूले। बहार कहि से भी पानी भरने से पहले देख ले वहां साफ सफाई होनी चाहिए। नल से पानी भरने से पहले नल को अच्छी तरह से धो लें। अपनी बोतल से किसी को पानी ना पीने दे, और ना ही दूसरों की बोतल से पानी पीयें।

चीज़ों को छूने से बचे

किसी भी अनावश्यक चीज़ों को जैसे बटन, दरवाजे, रेलिंग को न छुए। बटन और दरवाज़ों का प्रयोग करने के लिए अपने हाथ की कोनी का प्रयोग करे। 

मुह को ना छुए

किसी भी हालत में हमेशा याद रहे कि आपको अपने मुह के किसी भी हिस्से को कभी भी नही छूना है। अगर जरूरत पड़ती भी है तो छूने से पहले हाथ को साबुन या सेनिटाइजर से धो लें उसके बाद ही मुह को छुए।

सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें तो

यात्रा करने से पहले अपने हाथों को सैनिटाइज करें सुनिश्चित करें कि वाहन के ड्राइवर और स्टाफ सहित सभी यात्री मास्क पहनें हुए है। ध्यान दे कि शारीरिक दूरी बनी रहे (एक व्यक्ति पहर लाइन की हर ओर जिग-जैग तरीके में रहें) एसी को बंद रखें और ताजी हवा के लिए खिड़कियां खोल दें।

हमेशा यह याद रखें थूकें नहीं

थूक लगा कर पेज न पलटें, न नोट आदि गिनें। किसी के साथ भी खाना, पानी और बाकी समान शेयर ना करे। भीड़भाड़ वाले इलाके में जाने से बचें। हाथ न मिलाएं, नमस्ते करें। खांसते या छींकते वक्त कोहनी या टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करें।

घर पर आने के बाद

घर में चप्पल या जूते पहन कर ना जाए। घर में घुसने से पहले अपने चप्पल जूतों को खोल ले और घर के बाहर ही रख दे, नही तो उसे घर के किसी ऐसी जगह रख दे जहां कोई आता जाता ना हो। अपने समान को डिसइन्फेक्ट करे और किसी अच्छी जगह रख दें। घर में आते ही सबसे पहले अपने हाथ पैर अच्छे से धो लें और नाहा लें। उसके बाद बाथरूम की बाकी चीज़ों को धो ले जैसे नल, दरवाजे का हैंडल। दोबारा से वही कपड़े ना पहने उन कपड़ो को अलग से धो कर अच्छे से धूप में सूखने दें।

कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए:

  • ऊपर बताए गए SMS का ध्यान रहे और दूसरों को भी बताए
  • बार-बार हाथ धोएं। हाथ धोने के लिए, साबुन और पानी या एल्कोहल वाला हैंड रब इस्तेमाल करें।
  • अगर कोई खांस या छींक रहा है, तो उससे उचित दूरी बनाए रखें।
  • अपनी आंखें, नाक या मुंह को न छुएं।
  • खांसने या छींकने पर अपनी नाक और मुंह को कोहनी या टिश्यू पेपर से ढक लें।
  • अगर आप ठीक नहीं महसूस कर रहे हैं, तो घर पर रहें।
  • अगर आपको बुखार, खांसी है, और सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो डॉक्टर के पास जाएं. पहले ही कॉल कर लें।
  • स्थानीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के निर्देश मानें।


Wednesday, May 27, 2020

भूतिया स्टेशन (Part 1)

Horror Story
भूतिया स्टेशन
डर..... ये एक ऐसा शब्द है जिसे पढ़ते ही मन विचलित हो जाता है। पता नही क्यों लेकिन हमारे मन में बचपन से ही डर बुरी तरीके से बैठा दिया जाता है। 'सो जाओ नही तो भूत आ जायेगा', 'ये खा लो नही तो भूत तुम्हें खा जाएगा', 'जो रोता है भूत उसके पास आ जाता है', 'बाहर अकेले मत जाना भूत घूमता है' और भी बहुत कुछ। जिस उम्र में बच्चों को अपना नाम भी नही पता होता है, खाना क्या तीज है वो तक नही पता होता है, और हम उसे ये सब जरूरी बातें समझाने की जगह भूत के बारे में बताते है। मतलब उन्हें छोटी से छोटी चीज़े कुछ भी नही पता होती, लेकिन भूत के बारे में पता होता है कि भूत एक ऐसी चीज़ है जो बहुत बहुत बहुत ज्यादा खतरनाक है। खुशी क्या होती है दुख क्या होता है ये भी उन्हें नही पता होता लेकिन डर क्या होता है वो 6 महीने के बच्चों को भी अच्छे से पता होता है। जिस उम्र में बच्चों को शारीरिक और मानसिक रूप में मजबूत बनाना चाहिए उस उम्र में रोजाना भूत, आत्मा, चुड़ैल का नाम लेकर, डरावनी कहानी सुना सुना कर हम बच्चो को डरपोक बना देते है। उनके दिल दिमाग में पूरी तरह से डर को बैठा बैठा दिया जाता है।

तो आज की कहानी भी एक डर पे ही आधारित है।

पिछली बार की कहानी (भूतिया मकान) पढ़ने के बाद मेरे एक दोस्त ने अपनी कहानी सुनाई की कैसे डर किसी पर हावी हो जाता है और ये डर उस व्यक्ति से कुछ भी करवा सकता है।

(अब कहानी उसके शब्दों में)

WARNING: Reader's discretion is advised, should not be read by anyone under the age of 12.

मेरी बाहरवीं की परीक्षा होने के बाद मैं कुछ दिनों के लिए गांव चला गया। गाँव में दादा-दादी रहते है। उनकी मदद के लिए दिन में एक नौकर रहता हैं लेकिन हम उन्हें चाचा जी कहते है। फ़ोन पर दादा जी ने बताया था कि हमारे गांव की छोटी रेलवे लाइन अब बड़ी रेलवे लाइन बनने जा रही है इसलिए रेल सेवा बंद कर दी गयी है। इसलिए मैं बस से गांव गया। अब बड़ा हो गया था इसलिए पहली बार अकेले कहि गया था। बस से गांव के नजदीक के स्टैंड पर उतरने के बाद मैंने गांव के रेलवे स्टेशन वाला रास्ता चुना, ये देखने के लिए की काम कैसा चल रहा है। ये क्या! यहां तो कुछ भी काम नही हो रहा, पुराना रेलवे स्टेशन खंडर बन चुका है। पूरा रास्ता शमशान की तरह वीरान पड़ा है। बाद में मैंने दादा जी से पूछा तो उन्होंने बताया कि वहां मजदूरों ने भूत देखा था तब से कोई वहां काम नही करता तुम वहां से क्यों आए? उस रास्ते से कोई आता जाता नही वहां बहुत लोगो ने भूत देखा है! भगवान का शुक्र है कि तुम सही सलामत आ गए अब आगे से उधर मत जाना। ये लाइन सुनते ही मैं अंदर से पूरा कांप गया। पसीने छूट गए, रोंगटे खड़े हो गए कि अगर वहां मुझे भूत मिल जाता तो! बचपन से ही भूत से दुनिया ने इतना डरा रखा था तो ये डर तो लगना ही था। अब पता नहीं क्यों लेकिन मुझे अब रात को हर चीज़ों से डर लगने लगा। ऐसा लगता कि घर के शीशे से मुझे कोई देख रहा है। कानों को छूती हुई हवाएं कुछ बोल रही है। घर की खिड़कियों से कोई अंदर आ रहा है। इन सब बातों पर मेरा ध्यान ना जाए तो मैं फ़ोन चलाने लगता तो अचानक लगता कि कोई मेरे पीछे से मुझे कोई देख रहा है और आचानक से कंधे पर हाथ रखेगा। जैसे ही मैं पलंग से उतरूंगा तो कोई मुझे पलंग के नीचे से खींच लेगा। मेरे घर की छत से वो रेलवे स्टेशन नजर आता है। जब भी मैं अपने छत पर जाता हूं और उस स्टेशन को देखता हूं तो उसे ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे वहां से बुला रही है की 'तुम आओ मैं तुमसे मिलना चाहती हूं'। मैंने सोचा कि दादा-दादी को ये बात बता दु लेकिन दिमाग में आया कि वो क्या सोचेंगे? शायद यही मैंने सबसे बड़ी गलती कर दी। एक रात मैं सो रहा था और अचानक मेरे सपने में वही टूटा फूटा रेलवे स्टेशन नजर आता है। वो देखते ही मैं इतना सहम जाता हूं कि मेरी नींद खुल जाती है। पसीने से लत पत जब मैंने घड़ी देखी तो रात के 2 बज रहे थे। मैं पूरा डर चुका हूं, घड़ी की टिक-टॉक टिक-टॉक और डरा रही है। कोई मुझे आवाज दे रहा है। मैं जोर जोर से भागने लगता हूँ। दादा-दादी के कमरे की तरफ नही, उसी रेलवे स्टेशन की तरफ, हां! उसी स्टेशन की तरफ, पता नही क्यों लेकिन मैं भागा जा रहा हूँ। मुझे खुद कुछ समझ नही आ रहा, ना चाहते हुए भी मेरे कदम आगे बढ़ रहे है। जैसे लग रहा है कोई सफेद चीज़ मेरे पीछे पीछे भाग रही है। मेरे हर कदम के साथ वो भी अपने कदम बढ़ा रही है। अब पायल की आवाज मेरे कानों को सुनाई दे रही है। जैसे ही पीछे मुड़ता हूं आवाज गयाब हो जाती है। जो चाँद रोज प्यारा लगता था वो भी आज डरावना लग रहा है। मैं भाग रहा हूं, पायल की आवाज तेज हो रही है। मैं चिल्ला रहा हूं, पायल की आवाज और तेज हो रही है। जैसे जैसे मैं भाग रहा हूं आवाज बढ़ती ही जा रही है। अचानक मैं पीछे मुड़ा! मेरे पीछे कोई नजर नही आ रहा मेरी नजर मेरे घर की तरफ गयी वहां छत स कोई मुझे टाटा कर रहा है। मैं अब फिर स्टेशन की और भागने लगा। कदम लडख़ड़ा रहे है, सांसे अटक रही है, पसीने से पूरा शरीर भीग चुका है। पायल की आवाज अभी भी मेरा पीछा कर रही है। मैं जोर जोर से चिल्ला रहा हूं मगर कोई भी नजर नही आ रहा गले से आवाज भी नही निकल पा रही फिर भी मैं चिल्ला रहा हूं। स्टेशन पर अब मैं पहुच गया। रात अब अपने चरम पर पहुच चुकी है। मुझे ऐसा लग रहा है यहां पर कोई परछाई मुझे देख रही है। अचानक परछाई ने अपनी जगह बदल ली। मैं जल्दी जल्दी अपनी गर्दन घुमा रहा हूं, परछाई फिर मुझे किसी ओर तरफ से देखने लग रही है। मुझे कुछ समझ नही आ रहा क्या हो रहा है। डर पूरी तरह से मुझ पर हावी हो गया है। एक छोटी से आहट से भी सांसे रुक रही है। ऐसा लग रहा है कि स्टेशन की छत पर मुझे कोई बुला रहा है। स्टेशन के छत की सीढ़ियों की और अब मै भाग रहा हूं। अचानक से मैं गिर गया। खड़ा नही हुआ जा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे कोई मुझे दबाने की कोशिश कर रहा है। जैसे तैसे मैं उठ गया। फिर चिल्लाते हुए गिरते उठते मैं स्टेशन की छत पर पहुच गया। आंखों में डर, माथे पर पसीना। चारो तरफ बस अंधेरा अंधेरा और अंधेरा। ये क्या! छत पर कोई खड़ा है। डरावना चाँद, पायल की आवाज और ये डरावनी रात, ऐसा लग रहा है जैसे ये पहले भी कभी हुआ है। अब वो छत स कूदने की कोशिश कर रहा है। मैं कांपते कांपते उसकी और बढ़ रहा हूं। ठंडी हवा छू कर निकल रही है तो लग रहा कोई पीछे से आ कर कोई मेरा गला दबा देगा। उसके पास अब मै जैसे तैसे डरते डरते पहुच गया। अब वो कूदने की कोशिश कर रहा है, मैं उसे बचाने की कोशिश कर रहा हूँ। मुझे फिर कुछ समझ नही आ रहा है मैं ऐसा क्यों कर रहा हूँ। लग रहा है जैसे मेरा शरीर अब मेरा नही रहा अब ये किसी और का हो गया है। कहते है रात को आत्माओ की  शक्ति दुगनी हो जाती है और वो आम लोगो की बीच में आ जाती है। जिन्हें पता चल जाये कि आत्मा आस पास है उन पर वो हावी हो जाती है। शायद उस डरावनी रात भी मेरे साथ यही हुआ था। वो कूद गया! उसे बचाने के लिए अब मैं भी कूद गया....! ये क्या! मेरे कूदते ही वो नजर आना बंद हो गया! पायल की आवाज अब जोर-जोर से डरावनी हँसी में बदल गयीं। ऐसे लग रहा है जैसे वो हँसी मुझे कहा रही है कि मैंने अपना काम कर लिया। मैं जमीन पर गिरता हु। आंखे बंद हो रही है और आंखें बंद हो गयी। अब अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा और बस अंधेरा.....!

To be continued....


Nitish Kumar
नितीश कुमार

Disclaimer:


From this story, I am not promoting any type of Superstitions. The purpose of this story is only for entertainment purpose nothing else.

If someone's story mirrors this, it is just a coincidence.

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Wednesday, May 6, 2020

Love in Train

Love at first sight
Love at first sight

In a train, during my journey,
I saw a girl, sweet as honey.
I can't able to explain her beautiful smile,
I have never seen such a unique hairstyle.
That moment I have only one aim,
How I will ask her name?
Suddenly! That moment one miracle happen,
She questioned me " Can I ask you a Question"
I still have to pinch myself,
How it happened itself?
Now, I'm dreaming my whole life with her,
There is no one in my dream except her.
Suddenly! A clap broke that dream,
"Are you listening me?" She scream.
I nervously nodded my head,
"Now, I don't need any answer from you" she said.
All dreams that moment slipped like a sand,
I understand there is no one to hold my hand.

Nitish Kumar

Sunday, April 5, 2020

JL DAV की यादें


JL DAV की यादें


Jhabban Lal DAV Public School
Jhabban Lal DAV Public School

स्कूल नही जीवन का अटूट हिस्सा था JL DAV
कहानी नही जीवन का प्यारा क़िस्सा था JL DAV

टीचर्स के अनोखे नाम वाला प्यार था JL DAV
हमारे बचपन का पहला यार था JL DAV

जान बुझ कर देरी से स्कूल जाने का बहाना था JL DAV
फिर गार्ड और पीटी से बेवजह बहस करने का ठिकाना था JL DAV

असेंबली में ना जाकर क्लास में ही बैठना था JL DAV
फिर सविता मैम के आते ही छुप जाना था JL DAV

स्कूल शुरू होते ही पहला काम अर्रेंजमेंट देखना था JL DAV
नोटिस बोर्ड से पहले हंसा आंटी से अर्रेंजमेंट देखना था JL DAV

मैम के जाते ही क्लास के बाहर घूमने निकल जाना था JL DAV
कम्बोज मैम का नाम सुन कर ही वापिस क्लास में घुस जाना था JL DAV

नेहा मालिक मैम का अचानक से दिया टोन सुनना था JL DAV
और उनके सामने रोजाना खुद को मौन खड़ा करना  था JL DAV

नीनू मैम को अपनी सारी बाते बताना था JL DAV
उनके रूम में जाने का इंतज़ार था JL DAV

शिखा मैम के प्यारे फेस एक्सप्रेशन देखना था JL DAV
उनके सामने हमारा इंग्लिश बोलने का ओबसेशन दिखाना था JL DAV

विदुषी मैम के ट्रिक से फार्मूला याद करना था JL DAV
नीना भोला मैम के पीरियड में मैथ पढ़ना और लॉन्च करना था JL DAV

केमिस्ट्री लैब में बिना लैब कोट और बिना पढ़े जाना था JL DAV
फिर थोड़ी देर बाद संजय सर् का गुस्सा देखना था JL DAV

फिजिक्स लैब में फॉर्मेलिटी का प्रैक्टिकल करते रहना था JL DAV
बीच बीच मे कुलबीर सर् से मजेदार गप्पे मारना था JL DAV

ई जी रूम में गेम खेलना और मजे करना था JL DAV
पवन सर् से बेमतलब की सारी बाते करना था JL DAV

श्रुति मैम से पढ़ना कम बहस ज्यादा करना था JL DAV
सीमा सिंह मैम के क्लास में सबका मौजूद रहना था JL DAV

संगीता मैम के नोट्स को अंडरलाइन करना था JL DAV
आकांशा मैम के लम्बे नोट्स को याद करना था JL DAV

मंजू शर्मा मैम को देखते ही राधे राधे करना था JL DAV
गीता कपूर मैम से किलो पॉट होउर सुनना था JL DAV

सरिता मालिक मैम से कभी भी चाटा खा जाना था JL DAV
पंकज सर् के अजीब से पनिशमेंट को सहन करना था JL DAV

अनुपमा मैम का कभी गुस्सा कभी प्यार देखना था JL DAV
आरती जैन मैम का माँ वाला प्यार देखना था JL DAV

लाइब्रेरी में ग्रुप में पीछे बैठ कर फ़ोन चलाना था JL DAV
सबके साथ मिलकर टॉयलेट को बंक रूम बनाना था JL DAV

भल्ला जी के कैंटीन पर लॉन्च में टूट जाना था JL DAV
और दोस्त चीज़ छीन ले तो उनसे रूठ जाना था JL DAV

नई प्रिंसिपल से बच्चो और टीचर्स में ख़ौफ़ आ जाना था JL DAV
उनके आने के बाद इतने अच्छे बदलाव को देखना था JL DAV

सोचा भी ना वो सब कुछ अब स्कूल में होते देखना था JL DAV
डूबती कश्ती को पंख लगते और आसमां को छूते देखना था JL DAV

न्यू बिल्डिंग और ओल्ड बिल्डिंग में भेद भाव करना था JL DAV
क्लास से ज्यादा तो हमेशा ग्राउंड में वक़्त बिताना था JL DAV

DAV मैगज़ीन से एक दुसरो को मारना और प्लेन बनाना था JL DAV
अरेंजमेंट पीरियड में टीचर्स को खूब परेशान करना था था JL DAV

रोजाना कांच और बोर्ड को तोड़ना था JL DAV
फाइन के नाम पर सबका चुप हो जाना था JL DAV

एनुअल फंक्शन में टीचर्स का बिजी हो जाना था JL DAV
और हम सब का पूरे स्कूल में आतंक मचाना था JL DAV

सिर्फ स्कूल नही यादों का समुंदर है JL DAV
आज भी हम सबके दिल के अंदर है JL DAV

हम सबका अभिमान है JL DAV
हम सबकी शान है JL DAV

नितीश कुमार
Nitish Kumar


This poem is in remembering of Jhabban Lal DAV Public School, Paschim Vihar, New Delhi usually known as JLDAV or JL DAV.

If you want any change/recommendation/sugggestion then contact to Nitish Kumar on Instagram @nitish.poetry or @hindi__poetry


A very special thanks to our new Principal Ma'am Mrs. Anupama Bindra for making such changes in our school and make us proud JL DAV'ian

Sunday, December 29, 2019

भूतिया मकान


Horror Story
Haunted House

भूत, प्रेत, साया, डायन आदि पर आप चाहे विश्वास करते हो या नहीं, लेकिन उनके अस्तित्व को आप पूरी तरह नकार भी नहीं सकते हैं। यह एक ऐसा विषय है जिस पर काफी बातचीत होती है लेकिन इसका सच केवल वही जानता है जो इसे महसूस करता है।

स्कूल में हमारा स्पोर्ट का पीरियड था। हम 6-7 बच्चों ने डिसाइड किया आज हम ग्राउंड में नही जायेगे। यहीं क्लास में बैठ के गप्पे मरेंगे। हम सब एक सर्किल बना कर क्लास में बैठ के अपनी बाते करने लगे। अचानक वहाँ बातो बातो में भूतों की बात होने लगी। अब जैसा हर जगह होता है कि 'भूत-प्रेत होते है या नही?' इस टॉपिक पर बहस होने लगी। कोई कहने लगा  होते है कोई कहता नही होते। इन्ही आवाजों के बीच एक धीरी सी सहमी हुई आवाज आती है "होते है! कोई मानो या नही, लेकीन होते है, मैंने देखा है!" चारो तरफ सन्नाटा पसर गया। यह आवाज थी एक मेरे क्लासमेट की। सबके मुँह से एक साथ निकला।
कब? कहाँ? कैसे? 

(अब कहानी उसके शब्दों में)

ये बात तब की है जब मै 13 साल का था। हम जिस पार्क में खेला करते थे उसके पीछे एक टूटा फूटा दो मंजिला मकान था। जो भूतिया मकान के नाम से जाना जाता था। कहते थे कि इस मकान में एक वेल सेटल्ड फैमिली रहती थी, पति पत्नी और उनका एक लड़का उम्र कुछ 11-12 साल होगी। अचानक एक बीमारी से उस लड़के की मौत हो गई थी। इस दुख का बोझ वो दोनों नही उठा पाए, और कुछ दिनों बाद उनकी भी मौत हो गई। उसके बाद काफी लोगो ने उस मकान में नकारात्मक शक्ति होने का दावा करने लगे।

हम एक दिन बरसात के दिनों में शाम को उस पार्क में खेल रहे थे। आसमान को पूरी तरह बदलो ने ढक रखा था। सुन सुन कर ठंडी हवाएं कानो को छू कर गुजर रही थी। खेलते खेलते हमारी बॉल उस मकान में चली गयी। अब क्या? सब कुछ ना कुछ बोलने लगे।
कौन जाएगा बॉल लेने?
जिसने मारी है वो लाएगा।
रहने देते है शाम हो गयी अब कौन जाएगा?
मै उस वक़्त थोड़ा हिम्मत वाला था, मैंने बोला सब साथ में चलते है।
पागल है क्या! अंधेरा सर पर है और तू भूतों से पंगा लेगा?
भूत-प्रेत कुछ नहीं होते।
होते है! मम्मी बताती है।
हाँ, नही जायेगे, चलो घर चले, वैसे ही डर लग रहा है।
सही बोल रहा है ये, साथ में चलते है। (मेरे एक दोस्त ने मेरा साथ दिया)
नही मै नही जाऊँगा। डर लग रहा है।
हाँ! इस घर में भूत है मै भी नही जाऊँगा।
(अचानक एक आवाज आती है पीछे से)
अरे! नही है इस घर में भूत, मै एक दिन गया था।
(कोई 11-12 उम्र का लड़का हमारी तरफ आते हुए बोलता है)
तुम कौन?
अरे! मै भी यही पास में रहता हूँ। मै एक दिन गया था इस घर मे। कुछ भी ऐसा वैसा नहीं था। चलो सब साथ मे चलते है।
तुम्हें तो कभी यहाँ हमने देखा नही।
मै भी तो यही खेलता हु पता नहीं क्यों नहीं देखा? चलो जल्दी चलते है फिर घर भी जाना है।
हां यार चलते है, फुर्र से जाकर बॉल ले आते है। (मैंने उसकी बात में हामी भरी)
(अब सब ने हिचकिचाहट में हाँ में अपना सर हिला दिया)

अब हम कितने भी हिम्मत वाले क्यों ना हो, लेकिन दिल मे थोड़ा डर तो रहता ही है। हम सब धीरे धीरे घर की और बढ़ने लगे, पैर लड़खड़ा रहे है, सर्द हवाएं छू कर गुजर रही है। सूरज छुपने को तैयार है। बारिश होने से पहले का वो मंजर नजर आ रहा है। अचानक बादल गरजता है।
मम्मी! (एक लड़का चिलाता है)
अरे! कुछ नही हुआ बारिश होने वाली है, जल्दी चलते है। (उस लड़के ने गुस्से में कहा)
उस घर का मै दरवाजा खोलता हूं, घर की और गहरी सांस लेते हुए हम आगे बढ़ते है। घर मे थोड़ा अंधेरा है। चारो और दीवारों पर मिट्टी की परत जमी है। हर तरफ मकड़ी के बड़े बड़े जाले है। जिसमे मकड़ियां खुद के ही जाल में फस कर तड़प रही है और मरने का इंतजार कर रही है। हम काँपते हुए आगे बढ़ रहे है। जैसे जैसे कदम आगे बढ़ रहे है दरवाजे से आ रही रोशनी कम होती जा रही है। घर का तापमान धीरे धीरे कम होता प्रतीत हो रहा है। सन्नाटा पसरा हुआ है। एक दूसरे की सांसे हमे सुनाई दे रही है। हम घर के काफी अंदर पहुंच गए है। हमारा शरीर ठंडा हो रहा है। अचानक किसी के रोने की आवाज आती है। गला हमारा भर गया। सांसे रुक गयी। सब चिलाते हुए भागने लगे। उन सब के पीछे मै भी जैसे ही दो कदम भागा किसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। गले से आवाज निकलना बंद हो गयी। रोंगटे खड़े हो गए। पैर ठंडे पढ़ गए। शरीर वही जम गया। सब घर से भाग गए है। अब अकेला सिर्फ मै इस घर मे! 
अरे! मै हूँ, डर क्यों रहे हो? देखो! बिल्ली रो रही है। (जो लड़का हमे बाहर मिला था उसने मुझे रोकने के लिए मेरा हाथ पकड़ा था।) 
भाई तुम भी चलो, सब भाग गए हम ही दोनों अकेले रह गए है। बहुत डर लग रहा है मुझे। (मैं डरते हुए उस लड़के को कहता हूं)
मै साथ मे हु ना! डरना क्या? बस बॉल ढूंढ लेते है। (ये बोलते ही वो आगे बढ़ता है, मेरे कदम भी नाजाने ना चाहते हुए भी उसके पीछे बढ़ने लगते है)
आगे मैं ये क्या देखता हूं? वहां एक पूजा का सिहांसन बना हुआ है। बीच मे यज्ञ की जगह जिसमे कुछ जली हुई लकड़ियों की राख है। उसके चारों तरफ़ बैठने की गद्दी है। लग रहा है कुछ दिन पहले ही वहां यज्ञ हुआ है। ये क्या? मुझे धुएं की खुशबू महसूस हो रही है। लग रहा है अभी अभी कोई यहां यज्ञ करने लगा। घर पूरा ठंडा हो गया है। चेहरे पे पसीना। वहां एक तस्वीर है जिसपे माला है। तस्वीर देखने के लिए मै आगे बढ़ता हूं। तस्वीर पलट कर देखता हूँ। सांसे रुक गयी। पीछे से कोई जोर जोर से हंसने लगा। मै दरवाजे की ओर भागा। दरवाजा बंद हो गया। मै ऊपर की सीढ़ियों की ओर दौड़ा। बादल फिर गरज रहे है। हसने की आवाज थमने का नाम ही नही ले रही। मै सीढ़ियों से टकरा कर नीचे गिरता हूं। उठा नही जा रहा लेकिन फिर भी पूरी ताकत लगा कर उठता हूं। जितनी ताकत है उतनी ताकत से ऊपर की ओर दौड़ रहा हूं। लग रहा है कोई छाया भी मुझे पकड़ने मेरे पीछे दौड़ रहा है। जैसे जैसे कदम बढ़ रहे है दिल की धड़कने और तेज होती जा रही है। ये क्या? ऊपर तो पूरा अंधेरा है, कहि कुछ भी नहीं दिख रहा। चिलाया भी नहीं जा रहा है।शरीर पूरा हल्का हो गया है। लग रहा है अब हिम्मत नहीं है कुछ भी करने की। मैं अब पूरी हिम्मत हार चुका हूं। एक छोटी सी रौशनी नजर आयी। यही रोशनी अब उम्मीद लेकर आयी है। मै खुशी से उस रौशनी की और बढ़ने लगा। ये रोशनी तो स्ट्रीट लाइट की है जो बालकनी के दरवाजे से आ रही है। मैं पूरी ताकत लगा कर दरवाजा खोलता हु। अब मै घर की बालकनी पर पहुच गया। बहार खड़े मेरे दोस्त चिला रहे है। 
क्या हुआ? 
क्या हुआ?
बहार आजा।
पागल है क्या तू? ऊपर क्या कर रहा है?
जल्दी नीचे आ।
चल अब घर चलते है।
बादल जोर जोर से गरज रहे है। सूरज डूब चुका है। रात हो चुकी है। चारो और अंधेरे के बीच स्ट्रीट लाइट के नीचे दोस्तो का डरा हुआ चेहरा। मुझपे बारिश की बूंदे पड़ने लगी। मेरे जुबान से शब्द बहार नही आ रहे। मै कुछ बोलना चाह रहा हूं, लेकिन लग रहा है मुझे कोई बोलने से रोक रहा है। अचानक मै बालकनी से नीचे गिर गया। धीरे धीरे आँखे बंद हो गयी और जब खुली तो मै हॉस्पिटल में था।

(अब खुद मेरे शब्दों में कहानी)

अब मेरे दोस्त की इस कहानी के बाद हमारे स्कूल के उस क्लास में हम 6-7 बच्चे बस एक दूसरे का चहरा देख रहे थे।
मैंने अपने उस दोस्त से धीरी आवाज में पूछा "जो लड़का तुझे बहार मिला था, उसका क्या हुआ?"
मेरे दोस्त ने सांसे भरते हुए पसीना पोछते हुए आंखों में आँखे डाल कर (उसकी आँखों में डर था) धीमी आवाज में कहा "वो तस्वीर उस लड़के की ही थी, और उसी ने मुझे बालकनी से धक्का दिया था।"

Nitish Kumar
नितीश कुमार


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Thursday, August 15, 2019

15 August

Independence day shayari
तिरंगा

इस तिरंगे से ही है हमारी पहचान,
यही है हमारे देश का अभिमान।
मालूम है आज हम करेंगे इसका सम्मान,
मगर कल मत होने देना इसका अपमान।
कहीं पड़े दिखे तिरंगा तो उसे उठा लेना,
हो दिन कोई सा भी तुम रोजाना,
अपनी देश भक्ति दिखा देना।।

Nitish Kumar
नितीश कुमार

Wishes you all Very Happy Inpendence Day...
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

Jai hind... Jai jawan... jai kishan... jai vigyan...
Vande Matram... Bharat mata ki jay...

मेरी सभी बहनो को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं।

रक्षाबंधन स्वन्त्रता दिवस के दिन आया है,
हमारी बहनो के लिए आज़ादी का संदेश लाया है।

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Sunday, August 4, 2019

दोस्ती

Friendship day
Friendship

आज दोस्ती पर लिखना चाह है मैंने,
एक खूबसूरत रिश्ते को बयां करना चाह है मैंने।

खून का रिश्ता तो भगवान बनाते है,
जो रिश्ता हम बनाये वो दोस्त कहलाते है।
हर संकट की घड़ी में आपका साथ दे जाते है,
इसलिय तो ये खून के नही दिल के रिश्ते कहलाते है।।

ख़ुशियों में तो सब साथ देते है,
दुखों में जो शख्स साथ देता है।
ये दुनिया उसे दोस्त बुलाते है,
जो हरदम आपका साथ निभाते है।।

दोस्ती जिंदगी के अंधेरे में,
खुशियों की चमक लाती है।
हो कैसी भी परेशानी आपके घेरे में,
दोस्ती उसे भगा ले जाती है।।

जब कोई जिंदगी में है उलझा,
दोस्त ने ही तो है उसे समझा।
हर ग़म में आपका साथ दिया,
हर परेशानी को आपसे दूर किया।।

अगर घरवाले पेड़ो की छांव है,
तो दोस्ती उसमे शीतल हवाएं है।
हर परेशानी में घरवाले साथ देते है,
तो दोस्त भी कोनसा छोड़ के जाते है।।

नितीश कुमार
Nitish Kumar

आप सभी को मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
Wishes you all a very happy friendship day.

This is a poem on friendship in hindi for friendship day.

This poem is dedicated to all my friends specially
Ankit Yadav
Ayaan Alam
Harsh Singh
Satyam Dwivedi
Saba Karim
Suraj Singh
and all remaining ones.

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