Saturday, June 22, 2019
शायरी
Labels:
Shayari-शायरी
Location:
New Delhi, Delhi, India
Sunday, June 9, 2019
Wednesday, May 29, 2019
वो भी क्या दिन थे
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| वो भी क्या दिन थे |
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे,
तेरी छोटी सी खुशी को भी हम बड़ी में कन्वर्ट किया करते थे।
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे।।
साथ बैठना, साथ खाना और साथ रोया करते थे,
तेरी हर छोटी सी खुशी के लिए लड़ा करते थे।
तेरे साथ किसी और का होना बहुत चिड़ा करते थे,
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे।।
ना अब वो तो वापस आएंगे ना ही तेरी वो बातें,
बस एक तेरी सारी मेमोरी के सहारे जिया करते थे।
तेरा होना बहुत मायने रखता था,
जब तेरे को देख के जिया करते थे,
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे।।
आज भी किसी और के साथ देखकर बुरा तो लगता है,
जब वक्त ही बदल गया तो फिर तेरे से बदलने का क्या उम्मीद किया करते थे।
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे।।
तेरे साथ रहने के लिए विश मंगा करते थे,
जब दोस्त ही अपने नही रहे तो बाकियों से क्या उम्मीद किया करते थे।
तेरे साथ हर एक दिन नया सा लगता था,
पर यू नही सोचा था की एक दिन तू ही पूरा नया हो जाएगा।
वो भी क्या दिन थे जब हम साथ रह करते थे।।
Labels:
Poems-कविता
Location:
New Delhi, Delhi, India
Saturday, May 25, 2019
सूरत हादसा
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| सुूरत हादसा |
वो इतिहास लिखने की नींव रख रहे थे,
वो इतिहास बन के रहा गए।
वो किसी हादसे का नही,
प्रशासन की लापरवाही का शिकार हो गए।।
सूरत हादसे में मारे गए बच्चे और शिक्षक को भावपूर्ण श्रदांजलि। उनकी आत्मा को न्याय और शांति मिलने की कामना करता हूं।
क्या हुआ था?
मई 24, 2019 के दुपहर गुजरात के सूरत में 4 मंजिला तक्षिला कॉम्प्लेक्स में शार्ट सर्किट की वजह से आग लग गयी। आग लगने के वक़्त वहाँ कक्षा 11 की गणित की कोचिंग क्लास चल रही थी जिसमे 40-45 बच्चे पढ़ रहे थे। आग से बचने के लिए कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले कुछ छात्रों ने ऊपर से छलांग लगा दी । हादसे में 23 बच्चो समेत अध्यापक की मौत हो गयी। हादसे में प्रशासन की लापरवाही पाई गई।
Friday, May 24, 2019
Tuesday, May 14, 2019
मुझे पसंद है
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| मुझे पसंद है |
चेहरे पे अलग सी मुस्कान रखना,
हर दफा मुह में पेन को चबाना,
थोड़ी थोड़ी देर में झुलफो को पीछे करना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
छोटी छोटी बातों में बड़ी खुशियां ढूंढना,
चाहे कैसा भी हो गम मगर शांत रहना,
हर बात को बड़ा चढ़ा के बोलना,
खुद की जुबानी खुद की तारीफ करना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
तैयार होते ही पहली तस्वीर मुझे भेजना,
मुझे पसंद आए जब ही बाहर निकलना,
नही तो दोबारा एक और तस्वीर भेजना,
और मेरे एक हाँ का बेसब्री से इंतज़ार करना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
मुझे देख कर उनका यूँ शर्मा जाना,
शर्माते हुए अपना चश्मा ठीक करना,
अपनी नशीली आंखों में और नशा भरना,
चेहरे पे आई हुई घबराहट को छुपाना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
गुड़ मॉर्निंग से गुड़ नाईट तक विश करना,
सुबह से शाम तक कि हर दास्तां सुनाना।
छोटी से छोटी बात मुझे बताना,
खुशी हो या ग़म सब मे शामिल करना।।
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
छोटी छोटी बातो पे मुह बनाना,
लाखो दफा मनाने पे भी ना मानना,
लेकिन एक चॉक्लेट देखते ही सब भूल जाना,
फिर बच्चा बन उस चॉक्लेट को खाना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
मेरे बालो को बेवजह खराब करना,
फिर उसे अपनी पसंद का बनाना,
कपड़े को अपने हिसाब से ठीक करना,
यू नही इसे यू रखा करो ये बोलना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
शरारते कर के मुझे परेशान करना,
मेरे गुस्से करने पे मुझे ही सुनाना,
फिर मेरे रूठने पे अपना प्यार दिखाना,
थोड़ी ही देर में मेरे चेहरे पे मुस्कान ला देना,
मुझे पसंद है उनका ये सब करना।
नितीश कुमार
Nitish Kumar
Labels:
Poems-कविता
Location:
New Delhi, Delhi, India
Wednesday, May 1, 2019
मजदूर
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| मजदूर |
जिनके हाथ हर दफा मिट्टी में रहते है,
सुबह से शाम वो बोझ उठाते रहते है।
सूरज से पहले वो घर से निकल जाते है,
चंद्रमा के साथ देर रात वो घर को आते है।।
वो और कोई नही हमारे देश के मजदूर होते है।
जो रोजाना सबको खुशियां देते है,
मगर खुद की खुशियों को कहि बेच देते है।
जो सबके जीवन मे तो रंग भर देते है,
मगर खुद के जीवन को बेरंग छोड़ देते है।।
वो और कोई नही हमारे देश के मजदूर होते है।
सब को तो वो घर बना के देते है,
मगर खुद फुटपाथ पे सोते है।
वो मेहनत तो दिन रात करते है,
मगर पैसे नाम भर का ही लेते है।।
वो और कोई नही हमारे देश के मजदूर होते है।
जिस दिन बिन काम रह जाते है,
उस दिन वो खा नही पाते है।
झूठी मुस्कान लिए सो जाते है,
मगर बेईमानी का वो नही खाते है।।
वो और कोई नही हमारे देश के मजदूर होते है।
जो खुद का इलाज नही करवा पाते है,
परिवार के लिए सारे ग़म सहन कर जाते है।
खुद के बच्चों को स्कूल नही भेज पाते है,
हर खुशियों से वो वंचित रह जाते है।।
वो और कोई नही हमारे देश के मजदूर होते है।
नितीश कुमार
Nitish Kumar
Labels:
Poems-कविता
Location:
New Delhi, Delhi, India
Monday, April 29, 2019
उसकी खूबसूरती
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| उसकी खूबसूरती |
उनके बारे में भी आज लिखना चाह है मैंने,
खूबसूरत चांद को कागज़ में समेटना चाह है मैंने।
लेकिन समझ नही आ रहा क्या लिखूं,?
उनकी नशीली आंखों के बारे में लिखूं?
या फिर लिखूं उनके वो घुंगराले बाल?
या लिखूं घायल कर देने वाली उनकी चाल।
उनकी आंखों का काजल भी कितना इतराता होगा,
खुद को इस जहां में सबसे खुशनसीब पाता होगा।
उनकी आँखों को वो प्यारा चश्मा और नशीला बनाता है,
उन्हें देख वो चांद भी खुद को कमजोर पाता है।
उनके वो प्यारे होठ और उसमें गुलाबी रंग,
उनके वो उलझे झुल्फे और उसका रेशम रंग।
छोटी सी चिंता में बच्चा बन पेन को मुंह चबाना,
चेहरे पे आए झुलफो को नादानी से पीछे करना।
यही छोटी छोटी अदायें तो हम जैसो को मार देती है,
रहे कहीं भी निगाये तो उन्ही की और मुड़ जाती है।
जिन खूबसूरती ने हमे पागल बनाया है,
देखो आज उन्हें यहां सजाया है।
अभी तो बहुत कुछ लिखना है,
लेकिन क्या करें? उन्हें दुनिया की नजरों से भी तो बचाना है।
नितीश कुमार
Nitish Kumar
Wednesday, April 17, 2019
लोगो को बदलते देखा है हमने
जिनके हाथ पकड़कर चलना सीखा,
जिनके कंधो पे चढ़कर दुनिया को देखा,
उन्हें ही घरों से धक्के मारकर,
निकालते देखा है हमने।
लोगो को बदलते देखा है हमने।।
चंद रुपयों के लिए अपनो से झगड़ते,
और गैरो से रिश्ते बनाते देखा है हमने।
मंदिर में लाखों का दान करते,
और फकीरो को गालियां देते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिस देश से सब कुछ लिया,
उस देश को ही लूटते देखा है हमने।
जिस भारत माँ ने नाम बनाया,
उनका ही अपमान करते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिन शिक्षको से शिक्षा का पाठ लिया,
उन्हें पैसो का पाठ पढ़ाते देखा है हमने।
जिन किताबो से विद्या को लिया,
उन किताबो को फेकते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिन संस्कृति से दुनिया में पहचान बनाई,
उन संस्कृति को ही खोते देखा है हमने।
जिन के उपकारों से मंजिल पायी,
उन्हें ही भूलते देखा है हमने।।
लोगों को बदलते देखा है हमने।
जिन के लिए कमाते है देर रात तक,
उनसे ही दो पल बात ना करते देखा है हमने।
लोगो को जन्म से मृत्यु तक,
कई रंग बदलते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
नितीश कुमार
Nitish Kumar
जिनके कंधो पे चढ़कर दुनिया को देखा,
उन्हें ही घरों से धक्के मारकर,
निकालते देखा है हमने।
लोगो को बदलते देखा है हमने।।
चंद रुपयों के लिए अपनो से झगड़ते,
और गैरो से रिश्ते बनाते देखा है हमने।
मंदिर में लाखों का दान करते,
और फकीरो को गालियां देते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिस देश से सब कुछ लिया,
उस देश को ही लूटते देखा है हमने।
जिस भारत माँ ने नाम बनाया,
उनका ही अपमान करते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिन शिक्षको से शिक्षा का पाठ लिया,
उन्हें पैसो का पाठ पढ़ाते देखा है हमने।
जिन किताबो से विद्या को लिया,
उन किताबो को फेकते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
जिन संस्कृति से दुनिया में पहचान बनाई,
उन संस्कृति को ही खोते देखा है हमने।
जिन के उपकारों से मंजिल पायी,
उन्हें ही भूलते देखा है हमने।।
लोगों को बदलते देखा है हमने।
जिन के लिए कमाते है देर रात तक,
उनसे ही दो पल बात ना करते देखा है हमने।
लोगो को जन्म से मृत्यु तक,
कई रंग बदलते देखा है हमने।।
लोगो को बदलते देखा है हमने।
नितीश कुमार
Nitish Kumar
Friday, April 12, 2019
याद आती है
याद आती है हमारी पहली मुलाकात,
जब जागे थे हमारे प्यार भरे जज़्बात।
उस दिन अचानक आपका हमसे यू टकरा जाना,
दो पलो के लिए ही मगर आपका हमारे सामने आना,
वो हमारा हिचकिचाना और आपका हमे देख मुस्कुराना,
फिर वो हमारा शर्मा जाना और आपकी यादों में खो जाना,
क्या होता है प्यार हमने उसी हसीन पल में था जाना।
याद आती है हमारी दुसरी मुुलाकात,
जब हुई थी हमारी सहमी सी बात।
हमने घबराते हुए आपसे आपका नाम पूछ लिया,
आपने भी हमें शरमाते हुए अपना नाम बता दिया।
शरमाते घबराते समझ लिए थे एक दूसरे के जज़्बात,
बातो बातो में अपने हाथों में लिया था आपका हाथ,
और वही से शुरु हो गयी थी हमारे प्यार की पहली बात।।
याद आती है हमारी अगली मुलाकात,
मोहब्बत सी पूर्णिमा की वो रात।
आपने तो आँखें भी ना मिलाई थी,
हमे देख कर तो स्वप्न परियां भी शर्मायी थी,
जुगनुओं ने भी हमे देेख कर अपनी शरारतें दिखाई थी।
भूल कर भी नही भूल सकता मै वो हसीन रात,
क्योंकि वही से हुई थी हमारे पहले प्यार की शुरुआत।।
याद आंती है हमारी सारी मुलाकाते,
और प्यार भरी हमारी सारी बाते।
नितीश कुमार
Nitish kumar
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